Wednesday, February 16, 2011

दिल की आवाज़

आवारा


शाम के आठ बज रहे थे, मोबाइल ने घन-घनाना शुरू किया तो रीमा ने करवट बदल कर देखा कि फिर वही नम्बर। पहले तो उसने काल रिसीव नहीं करना चाहा मगर रिंग पर रिंग बजा जा रहा था तो उसने अचानक काल रिसीव कर कहा ‘तुमसा आवारा लड़का मैने अपने जीवन में नहीं सोचा था’ और काल डिसकनेक्ट हो गया। इतना सुनना था कि फोन करने वाला सन रह गया, मानो उसे सांप ने डस लिया हो। पिछले चार साल के सम्बन्ध में उसने रिंग तो कितनी बार किया होगा मगर शुरूवाती जाड़े की वह शाम उसके लिए तपती गर्मी के झोंकों से कम न था।
उस शाम के चार साल पहले तक समीर की जिन्दगी विरान सहरा में उड़ते रेत की मानिंद भटक रही थी। कब शाम और कब सुबह होती उसको इसका इल्म न रहता। जिन्दगी की रंगीनियों और प्यार की बारीकीयों के बारे में उसनें कभी सोचा भी होगा, ऐसा उसे नहीं लगता। बस एक लिखने का धुन सवार रहता उस पर और वह उस धुन में अक्सर बुझा रहता। वक्त की रेत पर जिन्दगी धीरे-धीरे कट रही थी। तभी एक दिन समीर के खास दोस्त की मोबाइल का रिंग बजा। रिसीव करने पर आवाज आयी, हैलो..... आप कौन, चूंकि नम्बर अंजान था सो उसने काल करने वाले से यह सवाल पूछा। उत्तर था, आप से ही बात करनी थी। इतना सुनना था कि दोस्त ने जवाब दिया कि मैं अंजान लोगों से बात नहीं करता और फोन काट दिया।
रात बीती सुबह हुआ फिर आयी वो शाम जिसने समीर की जिन्दगी में ऐसा भूचाल पैदा किया कि वह उसे याद कर आज भी यादों की सफर पर चला जाता है। शाम के सात बज रहे थे, बाजार से होता हुआ समीर घर की जानिब मुखातिब हुआ ही होगा कि उसके मोबाइल पर डाइवर्ट काल आया। हैलो... हैलो, काफी नाजुक व मखमली आवाज। आप कौन, ऐसा आवाज कि जिसे सुन कर कोई भी नाम बताने से गुरेज न करे। सो समीर ने जवाब दिया.... समीर कहते हैं लोग। इतना सुनना था कि काल डिसकनेक्ट हो गया। उस मखमली आवाज ने समीर को पूरी रात बेचैन रखा। रात भर वह सोचता रहा, कौन... कहाँ से.... क्यों ? फिर दूसरे दिन उसी नम्बर से काल आया। आप कौन, समीर ने बस यही पूछा था उससे। जवाब भी उसने समीर की अन्दाज में ही दिया, रीमा कहते हैं लोग और फिर फोन कट गया। फिर जो सिलसिला चालू हुआ वो दरिया की रवानी की तरह बहता रहा। बीच-बीच में मौजों ने जरूर कभी-कभार हिचकोले लिये होंगे मगर रवानी में कमी न आयी। रोज शाम के वक्त समीर के मोबाइल पर उसी नम्बर से काल और मिसकाल आता रहा। फिर शुरू हुआ बातों का ऐसा दौर जिसने दोनों को एक अन्जान रिष्ते में कैद कर दिया। बातों ही बातों में चार साल का तवील सफर कैसे बीत गया, इसका तनिक भी एहसास नहीं हुआ।
बातों का सिलसिला बढ़ता गया, दिलों की दूरियाँ नजदीकियों में तब्दील होती गयीं। बरबस चीजों से लगाव बढ़ता गया। रंग, खुशबू और प्रकृति में मन रमता गया। अन्ततः दोनों दिल शायद प्यार रूपी सागर में गोते खाने लगे। बस एक यही वजह था कि दोनों प्यार को जिन्दगी और जिन्दगी को प्यार समझ बैठे। दोनों का एक-दूसरे पर अधिकार बढ़ता गया। एक-दूसरे की पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखना अब दोनों का आपसी मसला बन गया। समीर को काला रंग पसन्द नहीं था सो रीमा ने काली चीजों से दूरी बना लिया। यहाँ तक की काला कपड़ा पहनना छोड़ दिया। रिश्तों की डोर इतना मजबूत होता गया कि समीर की हर पसन्द रीमा की पसन्द और रीमा की हर पसन्द समीर की पसन्द बना। वक्त धीरे-धीरे गुजरा जा रहा था। बातों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इसी बीच रीमा को परीक्षा देने शहर जाना पड़ा। शहर में रीमा नई थी, न वहाँ कोई सहेली, न ही कोई आत्मीय सम्बन्ध। पिंजरे में कैद बुल-बुल की माफिक रीमा तड़प उठी। हफ्तों समीर से बातें न हो पायी, बेचैनी बढ़ता गया। फिर तरकीब निकला, रीमा ने पड़ोस की आंटी की लड़की से दोस्ती कर ली और उसीके सहारे बातो का दौर पुनः चल पड़ा। वक्त, बेवक्त बातें होती मगर सुकून था कि सम्पर्क तो कायम है। पूरे छः माह तक रीमा ने कैद की जिन्दगी गुजारी। फिर आजादी मिली परीक्षा खत्म कर गाँव वापसी हुई।
समय तो नियत गति से बहता चला जा रहा था, उस पर किसका बस है। जिन्दगी में पड़ाव तो कई आये मगर दोनों ने रूकना गवारा नहीं किया। एक दिन भी अगर बातें न होती तो बेचैनी इस कदर बढ़ जाती मानों सांप ने डस लिया हो या बिच्छू ने डंक मार दिया हो। समीर के खास दोस्त को दोनों की नजदीकीयों से चिढ़ होने लगा। उनकी बातें करना मानो इसके कलेजे पर सांप लोेटने जैसा हो। एक दिन समीर के उसी खास दोस्त ने कहा कि समीर सुना है रीमा की एक सहेली काफी सुन्दर है, यार मेरी उससे बात करा दो। चूंकि समीर का वह खास दोस्त रीमा से चिढ़ रखता था और उसने उसे कितनी बार गालियां भी दे चुका था सो रीमा तैयार नहीं हुई। समीर ने भी कहा कि तुम्हारा व्यवहार खराब हो चुका है इसलिए उससे तुम्हारी कभी बात नहीं हो सकती। समीर की ये बातें उसको तीर की तरह चुभीं। उसने समीर से कहा कि मैं तुम्हे और रीमा को इतना बदनाम कर दूंगा कि तुम लोग मुह दिखाने के काबिल नहीं रहोगे। फिर उसने इंतकाम लेने की ठानी। दोनों के बीच तल्खि़यां बढ़ती गयीं। समीर के दो और करीबी दोस्त थें, जिनसे वह अपने जीवन की हर पोशीदा राजों को बताया करता था। जिन्हे समीर ने समाज की गुमनामी से उजाले में लाने का सफल प्रयास किया तथा उन्हे वह अपने उस खास दोस्त से परिचय भी करवाया था। मगर वही दोस्त समीर के खिलाफ हो गयें। इंतकाम की आग दिन-ब-दिन तेज लपटों के साथ रिष्तों की डोर को जलाती चली गयी। दोस्त दुष्मनी पर आमादा हो गये। जो कभी एक-दूसरे से मिले बिना नहीं रहते आज ऐसी बेरूखी पर उतारू थे कि अगर सामना भी हो जाता तो मुंह फेर लेते। कहते हैं कि जर, जोरू और जमीन हर जंग की बुनियाद रही है। शायद इसी में से किसी एक वजह ने आपसी मन-मुटाव पैदा किया। समीर एकदम अलग-थलग पड़ गया और उसकी पूरी मित्र मंडली उसका दुष्मन बने बैठा था। शाजिसों का दौर चला। झूठी गाहियां, ऐसी कि जिसे सुनकर मानवता भी शर्मषार हो जाये। रीमा व समीर के रिष्ते को कलंति करने का हर शड़यंत्र रचा जाने लगा।
और फिर आयी दीपावली की प्रकाषमान रात, जिसमें पूरा देष प्रकाषित था। चारों तरफ दीप जलें, खुषियों क ऐसा कारवां जिसमें हर कोई सराबोर था। मगर उस रात दीप की जगह रीमा का दिल जल रहा था। रीमा के अरमान जल रहें थे। यहां तक की रीमा खुद धधक उठी थी। चूंकि रीमा के चाचा की लड़का की शादी समीर के खास दोस्त के भाई से हुई थी, जिससे समीर का जंग था। समीर ये कभी न सोचा था कि रिश्ते कभी इतने पतीत हो जायेंगे कि समाज के मर्यादाओं को भी लांघ जायेंगे। समीर के उसी खास दोस्त ने रीमा को बदनाम करने की एक सुनियोजित शाजिस रची जिसमें पूरा मित्र मंडली सरीक हुआ। जो दोस्त कभी समीर के अजीज थे आज रकीब बन बैठे थे। रीमा के दिल में ऐसी नफरत भरने की शाजिस हुई कि वह समीर से नफरत करने लगे। एक दिन वही खास दोस्त रीमा को उसकी सहेली समझकर समीर के खिलाफ भड़काने का असफल कोशिश कर चुका था फिर भी रीमा नहीं हिली। सो उसने रीमा की बहन को रीमा के खिलाफ इतना भड़काया कि वह आग बबूली हो गयी। आग में घी डालने का काम समीर के वही अजीज कर रहे थे जो आत रकीब बन बैठे थे। उन्होने रीमा की बहन से झूठी गवाही दी कि रीमा तो समीर के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है। होटलें अटेंड करती है, शापिंग करती है समीर के साथ। बहुत कुछ ऐसा जो सामाजिक रिष्तों को तार-तार करती हो वही बातें रीमा के बहन को बताई गयी। जबकि रीमा व समीर की मुलाकात शायद ख्वाबों में भी नहीं हुई होगी। ऐसी गवाही जिसे सुन कर एकबार जानकारों की भी आँखें धोखा खा जाये। क्योंकि जब अजीज रकीब बनता है तो उसकी बातों में सौ फीसदी सच्चाई झलकता है। इसलिए रीमा की बहन को भी उनकी झूठी बातों पर एतबार हो गया। फिर क्या था उस दीपावली की रात में रीमा को जलाना उसकी बहन के लिए आसान हो गया। गुस्से से लबरेज उसने रीमा से कहा कि तुम ऐसा निकलोगी, यकीन न था। तमाम ऐसे निराधार आरोप रीमा के उपर मढ़े गये जिसको सुन कर रीमा के होश फाख़्ता हो गये। जब रीमा की रूसवायी की खबर समीर के रकीब दोस्तों के पास गयी तो उनके खुशी के ठिकाने नहीं रहे। पार्टियों का दौर चला। मगर उन्हे ये मालूम नहीं था कि झूठ के पैर नहीं होते।
शाम का वक्त था, समीर दीपावली की रोषनी व खुषियों में शराबोर था और वी रीमा को भी उसी रोषनी में नहलाना चाहता था। मगर वह दीपावली की वह शाम रीमा के लिए अमावस से कम न थी। समीर बार-बार रीमा को रिंग किये जा रहा था और हर बार काल डिसकनेक्ट हो जाता। फिर रीमा ने काल रिसीव कर जो शब्द कहे उसे सुनकर समीर के होश व हवास जाते रहे। समीर के दोस्तों की चाल कामयाब हो चुकी थी। रीमा भी समीर से काफी दूर निराशा के गहरे खन्दक में जा धसी थी। बहुत आजीजी के बाद रीमा ने बात करना कुबूल किया। समीर से जब उससे सच्चाई और शाजिस की हकीकत बयान किया तो वह तड़प उठी। अब उसे अपने बेगाने व समीर अपना लगने लगा। रीमा के लिए रिष्तों के मायने बदल चुके थे। रीमा ने समीर से एक बात कही कि तुमने मेरे विष्वास का गला घोटा है, अपने व्यक्तिग जीवन के राजों को दोस्तों में बांट कर खुद को तमाशा बनाया। तुम्हारे दोस्त इतनी घटिया सोच रखते हैं, मैने कभी ऐसा सोचा नहीं था। तुमसे कोई शिकायत नहीं है मगर हाँ,
तुम आवारा हो और रीमा की आँखें छलक पड़ीं।
  • एम अफसर खान सागर

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