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Tuesday, December 22, 2020

अल्विदा आसिफ

राजकीय सम्मान के साथ एसएसबी जवान आसिफ सुपुर्द-ए-खाक
 
धानापुर शहीद पार्क में आसिफ को राजकीय सम्मान देते एसएसबी के जवान।

उत्तर प्रदेश के चन्दौली जनपद के धानापुर निवासी सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवान आसिफ खान (28 वर्ष) पु़त्र इसरार खान की सड़क हादसे में रविवार 20 दिसम्बर 2020 को लखनऊ के टेढ़ी पुलिया के पास रोड एक्सिडेंट में मौत हो गई। आसिफ की पोस्टिंग लखनऊ के मोहनलाल गंज में थी। सोमवार को तड़के जब आसिफ के मौत की खबर लोगों को मिली तो पूरे इलाके में मातम सा छा गया। परिवार वालों का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। धानापुर पठानटोली स्थित उनके आवास पर शोक व्यक्त करने वालों का हुजूम इकट्ठा हो गया। चार भाई में आसिफ तीसरे नम्बर पर थें, और परिवार का पूर बोझ उनके कंधों पर ही था। मिलनसार व्यक्तित्व के धनि आसिफ लोगों के आंखों का तारा था। देशभक्ति के जज्बे से ओत-प्रोत आसिफ पढ़ाई के दोरान ही देश सेवा के लिए तैयारी करने लगा था। जिन्दगी के उसका एक ही सपना था देश के लिए कुछ कर गुजरना। हादसों से मानों आसिफ का याराना था, उनके बड़े भाई मोहसिन खान बताते हैं कि जम्मू में पोस्टिंग के दारान उनकी गाड़ी सौ फिट गहरी खाई में जा गिरी थी, जिसमें वो गम्भीर रूप से घायल हो गये थे। दूसरे हादसें में उनके कमर में काफी चोटें आईं थी, जिसका आपरेशन भी हुआ था। फिर भी उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आयी थी। 
 

                                  धानापुर शहीद पार्क में आसिफ के अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब।

मंगलवार 22 दिसम्बर को भोर में आसिफ एसएसबी की गाड़ी से घर पहुंचा। चिर निद्रा में लीन आसिफ किसी से बात नहीं कर सकता था, लोग उसके दीदार को बेकरार थें मगर वो तो उस सफर पर निकल गया था, जहां से लोग कभी नहीं आते। घर, गांव व इलाके के लोगों का गम से हाल बेजार था। दोस्त, अहबाब, समाजी व सियासी लोगों का मजमा था। अंतिम बिदाई देने वालों की आखें नम थीं। दिन में दो बजे आसिफ को लम्बे काफिले के साथ सबसे पहले कस्बा स्थित शहीद पार्क ले जाया गया। जहां जिला प्रशासन सहित विभागीय लोगों ने गार्ड आफ आनर दिया। इसके बाद जगनियां स्थित कब्रिस्तान में आसिफ को को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इस दौरान घर, परिवार, गांव के लोगों के साथ एसडीएम प्रदीप कुमार, सीओ भवनेश चिकारा, सपा के राष्ट्रीय सचिव व पूर्व विधायक मनोज कुमार सिंह डब्लू, सपा प्रवक्ता मनोज काका, पूर्व सैनिक अंजनी सिंह, राजेश यादव, विधायक प्रतिनिधि अन्नू सिंह, प्रधान प्रतिनिधि रामशरण यादव गुड्डू, नैढ़ी प्रधान अंसार अहमद, भाजपा जिला महामंत्री सुजीत जायसवाल, हसन खान, सुहेल खान जन्नत, रूस्तम खान, सत्यदेव यादव, सहित भारी संख्या में क्षेत्रीय लोग मौजूद रहे। 

                                                            एसएसबी जवान आसिफ खान
 

देश सेवा के साथ समाज के लिए भी आसिफ कुछ कर गुजरने का माददा रखता था, गांव हो या दोस्त यार सबके लिए हमेशा खड़ा रहता। जब भी कोई उसे किसी मकसद के लिए पुकारता वो हाजिर रहता। बड़ों का सम्मान और छोटों से प्यार करना कोई उससे सीखे। कहते हैं अच्छे लोगों को ईश्वर जल्द अपने पास बूला लेता है। तकरीबन दो साल पहले ही आसिफ की शादी हुई थी, पत्नि और आठ महीने की छोटी बच्ची है। क्या उम्र ही थी उसकी। मुझे याद है नौकरी पाने से दो-तीन साल पहले आसिफ मेरे साथ लखनऊ के मोहिबुल्लापुर इलाके में दो दिन के लिए गया था। यह वही इलाका है जहां आसिफ का एक्सिडेंट हुआ। हम लोग दो दिन तफरीह किए, बेहद उत्साही व मनोरंजक स्वभाव का इंसान था। उसके जाने की खबर जब मुझे रात 11 बजे मिली तो मैं स्तब्ध हो गया। पूरी रात सो नहीं सका। यकी नही नहीं हुआ कि आसिफ हमें छोड़कर चला गया। अभी कुछ दिन पहले ही गांव के बाहर परती पर मिला था, अदब से सलाम किया। हालचाल हुआ। 


अल्विदा मेरे भाई आसिफ... तेरा यूँ जाना खल गया!


यह कोई उम्र थी जाने की जो तुम यूँ मुंह मोड़ कर हमसे चले गए। अभी कुछ दिन पहले ही तो सलाम-बन्दगी हुई थी परती पर। हमें यकीन ही नहीं था कि यह मुलाकात आखिरी होगा। यूँ तो तुम उम्र में छोटे थे मगर जिम्मेदारी की बोझ सबसे ज्यादा तुम्हारे मजबूत कांधे पर ही था। मुझे आज भी याद है... जब तुम एसएसबी में भर्ती नहीं हुए थे, तो हम लोग अक्सर गांव के बाहर परती पर मिलते। सालों पहले एक बार मैं तुम्हे अपने साथ लखनऊ ले गया था, उसी इलाके में जहाँ तुमने जिंदगी की आखिरी सांस ली! मोहिबुल्लापुर में ही हम एक रात आई वर्ल्ड पत्रिका के मालिक डॉ. नफीस अहमद के यहां रुके थे, उनके साथ हमने लखनऊ की सैर भी किया। फिर तुम कुछ साल बाद नौकरी में चले गए, रास्ता अलहदा हो गया। आज तुम्हें याद कर आंखे नम हो गईं। आसिफ बेहद मिलनसार व्यक्तित्व का धनी था, सबको ऐसा भाई सरीखा पड़ोसी मिले। अल्लाह रब्बुल इज्जत तुम्हे जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता करें और घर वालों को सब्र-ए-जमील अता फरमाएं!


अब हर लम्हा तुम्हारे बिना सूना सा लगेगा,
अलविदा कहकर तुम्हारी यादों में जीना पड़ेगा।

 

Saturday, November 14, 2020

अभिमत

बिहार चुनाव में एआईएमआईएम के उभार से बेचैनी क्यों?




बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में एआईएमआईएम ने सीमांचल के पांच सीटों पर जीत हासिल कर सेक्युरल दलों में बेचैनी पैदा कर यिा है तभी तो नतीजे आने के बाद सो-कॉल्ड सेकुलर जमातों और उनके हिमायतियों ने एआईएमआईएम नेता व सांसद असदुद्दीन ओवैसी पर वोट कटवा होने तोहमत लगाने की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए लानत भेजने का काम बखूबी कर रहे हैं! भारतीय लोकतंत्र ने सभी राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने का अधिकार दे रखा है! जिसके तहत राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दल राज्य विधानसभाओं व लोकसभा के लिए अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारते हैं और जनता उन्हें चुनती है या खारिज कर देती है! ठीक उसी तरह इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने प्रतिभा किया और जनता ने अपना फैसला वोट के जरिये सुनाया।
एनडीए गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद विपक्ष और उसके हिमायती। एआईएमआईएम और उसके नेता को वोट कटवा और भाजपा का एजेंट की संज्ञा देते फिर रहे हैं! सवाल उठता है कि आखिर हर बार विपक्ष अपनी विफलता का ठीकरा असदुद्दीन ओवैसी पर ही क्यों फोड़ती है? आखिर असदुद्दीन ओवैसी ही भाजपा के एजेंट कैसे हो जाते हैं? पड़ताल करें तो आसानी से मालूम होगा कि एआईएमआईएम के चुनाव लड़ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण से इनकी दाल नहीं गल पाती है। अगर बात सेकुलरिज्म की करें तो 2015 के चुनाव में नीतीश कुमार के जेडीयू के साथ लालू यादव की पार्टी आरजेडी व कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा व जीता भी मगर नीतीश कुमार ने पलटी मारते हुए भाजपा संग सरकार बना लिया। 2015 से पहले भी नीतीश कुमार भाजपा के साथ रह चुके हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शिवसेना के खिलाफ चुनाव लड़कर उसी के साथ सरकार में है! ऐसे में वो महागठबंधन में आये तो दाग धूल जाते हैं और असदुद्दीन ओवैसी एजेंट हो जाते हैं! असदुद्दीन ओवैसी ने एक इंटरव्यू में कहा कि उनकी पार्टी ने इस बार महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश किया मगर उसे नजर अंदाज कर दिया गया। तो एक राजनैतिक दल होने के नाते उन्होंने चुनाव लड़ा और 5 सीटों पर कामयाब रहे। जीतन राम मांझी और मुकेश साहनी की पार्टीयों ने भी 4-4 सीटें जीती तो ओवैसी कैसे वोट कटवा हुए, वोट लुटवा क्यों नहीं?
क्या लोकतांत्रिक देश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है? अगर इस मुल्क में नरेन्द्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह, साक्षी महाराज, कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर को चुनाव लड़ने और लड़ाने का अधिकार है तो फिर असदुद्दीन ओवैसी को क्यों नहीं? तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, मायावती, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी, मुकेश साहनी सरीखों को चुनाव लड़ने-लड़ाने का अधिकार है तो फिर असदुद्दीन ओवैसी क्यों नहीं चुनाव लड़-लड़ा सकते हैं? आप असदुद्दीन ओवैसी के सियासी नजरिए से भले इत्तेफाक न रखते हों मगर एक दल के नाते उन्हें चुनाव में शामिल होने और गठबंधन करने से सिर्फ इसलिए कि सेकुलर वोट के बिखराव के नाम पर नहीं रोक सकते!
असदुद्दीन ओवैसी सीमांचल के मुस्लिम वोटरों को समझाने में शायद कामयाब रहे कि धार्मिक व जातीय गोलबंदी के जरिये सियासत करने वाले दलों ने सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम वोटों की फसल बहुत काटी है मगर मुस्लिमों को सियासी भागीदारी उतनी नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए! मुस्लिम कयादत भी उन्हें मंजूर नहीं! बिहार में अगर देखा जाए तो AIMIM ने 20 सीटों पर प्रत्याशी उतारे जिसमें 5 जीते, 9 जगहों पर महागठबंधन और 6 पर एनडीए की जीत हुई जबकि 70 सीट पर कांग्रेस चुनाव लड़ी 19 प्रत्याशी जीते बाकी एनडीए गठबंधन! कांग्रेस नेता ऋषि मिश्रा ने खुद आरोप लगाया कि ‘अध्यक्ष मदन मोहन झा के वजह से आज हमारी सरकार नहीं बनी। 40 वर्षों से आप मिथिलांचल में राजनीति कर रहें। आरजेडी ने आपको 70 सीट दी और आप 19 सीट ही जीतें, आप से अच्छा प्रदर्शन लेफ्ट पार्टी करती है। मेरा सोनिया जी से निवेदन है कि आप हम कांग्रेसियों को बचा लीजिए।’
ऐसे में यह कहना कि असदुद्दीन ओवैसी वोट कटवा हैं मेरे हिसाब से ठीक नहीं बल्कि बिहार में ओवैसी वोट लुटवा साबित हुए हैं! यही सवाल कांग्रेस से भी होनी चाहिए कि मध्य प्रदेश और गुजरात के उपचुनाव के परिणाम क्या हैं जबकि ओवैसी की पार्टी ने वहां चुनाव भी नहीं लड़े? राष्ट्रीय स्तर पर सियासत में मुस्लिम कयादत के खाली जगह को भरने की कोशिश असदुद्दीन ओवैसी पूरे दमखम के साथ करने में जुटे हैं। जिससे मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण से विपक्षी दलों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में यह देखना है कि एआईएमआईएम बंगाल और उत्तर प्रदेश के आम चुनाव में क्या गुल खिलाती है?
    

Monday, August 19, 2019

सोशल मीडिया में बदजुबान होती अभिव्यक्ति की आजादी

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प सरीखे सोशल साइट्स ने वैश्विक स्तर पर लोगों को करीब आने का मौका दिया है तथा एक-दूसरे के विचारों और संस्कृति से परिचित भी कराया है। संचार का सदव्यवहार संवाद और संस्कृतियों के प्रसार का हमेशा से आधार रहा है। जिस तरह से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लोगों के विचारों में खुलापन आ गया है। सोशल मीडिया ने पूरे विश्व में लोगों को आन्दोलित सा कर दिया है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मुद्दे सोशल मीडिया पर अक्सर बहस के विषय बनते रहते हैं। राजनेता, खिलाड़ी, सिनेजगत के कलाकार सहित युवा वर्ग में सोशल मीडिया के प्रति काफी रूझान है। हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का यह बेहतर मंच साबित हुआ है मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका बेजां इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इस वैचारिक अतिक्रमण ने अभिव्यक्ति की आजादी को कुछ हद तक बदजुबान बना दिया है।
सोशल मीडिया का उपयोग संवाद के माध्यम के रूप में किया जा रहा था तो कुछ हद तक ठीक था मगर राजनीति के अखाड़ा में तब्दील होने के बाद यह आरोप-आपेक्ष का माध्यम तो बना ही इसके जरिए राजनीतिक दलों के समर्थक गाली-गलौज भी करते नजर आ रहे हैं। गुजरात में पटेल आन्दोलन और नोएडा के दादरी की घटना सहित विभिन्न संजीदा घटनाओं के बाद तनाव के लिए सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा किया जाना लाजमी है। यह सवाल सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि उसके इस्तेमाल करने वालों पर है। हाल के दिनों सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर धर्म विशेष, पार्टी विशेष और व्यक्ति विशेष के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और कमेंट ने इस बड़े माध्यम को आचरण विहीन जुबानी जंग का मैदान सरीखा बना दिया है। देश के बड़े सियासी नेताओं को सहित हर मुद्दों पर बेहूदा पोस्ट कर केे उसका मखौल उड़ाना निंदनीय है। असहमती का अधिकार लोकतंत्र में सभी को है मगर संवैधानिक दायरे में रह कर। हमें किस मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए इसका ख्याल रखना बेहद जरूरी है। इसके इस्तेमाल करते समय सभी को काफी जागरूक और संवेदनशील रहने की जरूरत है। आज कल सोशल मीडिया पर राजनेताओं का मखौल उड़ाना आम बात बन गया है। इसके लिए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता समेत समर्थक और विरोधी जिम्मेदार हैं। सियायी दल के नुमाइन्दों सतिह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व मंत्रियों के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर आसानी से देखने को मिल जाती हैं, जो कि हमारे अभिव्यक्ति के आजादी का बेजां इस्तेमाल के सिवा कुछ नहीं। इस चलन से सभी को बचने की जरूरत है। असहमती की दशा में हमें सहनशील हो कर अपने विचार रखने की जरूरत है। विरोध और समर्थन का तरीका सभ्य होना चाहिए।
धार्मिक विषयों पर कुछ लिखने या अपनी राय रखते समय यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारे पोस्ट से समाज का कोई तबका आहत न हो। धर्म आचरण का विषय है समाज का हर व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है कि वह खुद के धर्म का सम्मान जरूर करे मगर दूसरे धर्म के खिलाफ गलत टिप्पणी ना करे। ऐसी दशा में विरोधाभास कम देखने को मिलेगी। हमें यह सोचना होगा कि सोशल मीडिया एक बन्द खिड़की नहीं है वरन खुला आसमान सरीखा है। हमारी बात चन्द लोगों तक जरूर पहुंचती है मगर उसका दायरा नदी के उस बहाव की तरह है जिसे चाह कर नहीं रोका जा सकता। ऐसी दशा में कभी-कभी कुछ गलत और समाज के किसी खास तबके को आहत करने वाले पोस्ट वायरल हो जाते हैं, जो दो समुदायों, दो समाजों के बीच नफरत फैलाने के लिए काफी होते हैं। ऐसे पोस्टों पर शाब्दिक हिंसा जोरों से होने लगती है। जो कि बहुत ही खतरनाक दौर तक पहुंच जाती है। गाय और दादरी का मुद्दा इसके चन्द उदाहरण भर हैं।
सोशल मीडिया ने सूचना और संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दिया है। इस माध्यम ने न केवल लोगों को एक-दूसरे को जोड़ने का काम किया है बल्कि स्वतंत्र प्रतिक्रिया देने का सशक्त प्लेटफार्म मुहैया कराया है। हमें अपनी बातों को समाज के बीच बिना सेंसर के रखने का जरिया है सोशल मीडिया, इसका यह मतलब कत्तई नहीं की हम कुछ भी लिख और बोल दें। संवाद के इस सशक्त माध्यम के जरिये हमें शाब्दिक हिंसा फैलाने से बचने की सख्त जरूरत तो है ही साथ दूसरों की मर्यादा और निजता का भी ध्यान रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी के खिलाफ आरोप-आक्षेप लगा कर हम इस बड़े माध्यम का अपमान न कर खुद के संस्कारों को प्रदर्शित करते हैं। इस माध्यम का उपयोग करते समय हमें यह सोचने की जरूरत है कि अपनी सभ्यता और मर्यादा का ध्यान रख कर समाजहित की बातों और बेहतर सूचनाओं को फैलाएं। राष्ट्रीय एकता और विकास के मुद्दों पर सार्थक बहस से इस माध्यम का बेहतर सदुपयोग किया जा सकता है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर युवा वर्ग की संख्या ज्यादा है, ऐसे में युवाओं को चाहिए कि आतंकवाद और कट्टरता के खिलाफ व्यापक बहस कर लोगों जाकरूक करने का प्रयास करें। समाज में सद्भाव और समरस्ता को बढ़ावा देने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। सोशल मीडिया को गाली-गलौज और आरोप-आपेक्ष का माध्यम बनाने वालों को सोचने की जरूर है कि डिजिटल इण्डिया मुहीम को स्वच्छ भारत अभियान के तहत लाकर इस बड़े माध्यम का सार्थक इस्तेमाल किया जा सके और समाज को बेहतर संदेश दिया जाये।

Tuesday, March 20, 2018

विश्व गौरैया दिवस

घर आंगन की चिड़िया गौरैया की हिफाजत जरूरी
अभी कुछ साल पहले ही अम्मी जब सुबह के वक्त सूप में चावल को पछोरती और बनाती थीं तब छोटी-छोटी चिड़िया झुण्ड में चावल के छोटे टुकड़ों जिसे गांव में खुद्दी के नाम से जाना जाता है उसे खाने के लिए नुमाया हो जाती थीं। फुदक-फुदक कर हल्के कोलाहल के साथ दालान और रोशनदान के साथ पूरे मकान में मानो उनका कब्जा सा हो जाता। वो छोटी चिड़िया थीं गौरैया। जो हमारे और आप के घरों की मेहमान हुआ करती। बच्चों के लिए उड़ने वाली सहेली और घर के लिए मिठास भरी चहक जिसके बरकत से घर-आंगन गुलजार रहता। ऐसा नहीं है कि अब गौरैया नहीं आती मगर उनकी तायदाद दिन ब दिन कम होती जा रही हैं। गौरैया आज संकटग्रस्त पक्षि की श्रेणी में आ गयी है, जो कि पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ होती जा रही है। चन्द साल पहले तक गौरेया के झुंड को आसानी से घरों, गांव, खेत-खलिहान सहित सार्वजनिक स्थलों पर देखे जा सकते थे। लेकिन खुद को परिस्थितियों में ढ़ाल लेने वाली यह चिड़िया अब भारत ही नहीं बल्कि यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफी कम रह गयी है। इटली, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और चेक गणराज्य जैसे मुल्कों में इनकी संख्या जहां तेजी से गिर रही है तो वहीं नीदरलैंड में तो इन्हें ‘दुर्लभ प्रजाति’ के वर्ग में रखा गया है। इनकी संख्या में निरंतर आ रही कमी को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए विश्व गौरैया दिवस पहली बार सन् 2010 में मनाया गया। तब से यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है।
अमूमन हर साल गर्मी की आमद के साथ ही ये नन्ही चिड़ियां अपने लिए घरौंदे बनाना शुरू कर देती हैं। वक्त के साथ विकास के पैमानों में आये बदलाव ने मानव सभ्यता की गोद में पलने वाली इस नन्ही चिड़ियों से इनके आशियाना को छीन लिया है। पहले कच्चे और घास-फूस के मकानों में गौरैया बड़ी आसानी से अपने घोसलें बना लेतीं मगर आधुनिक कांक्रीट के मकानों में इनको घोसलें बनाने की जगह नही मिल पा रही हैं। शहरीकरण ने गावों की दहलीज को अपने गिरफ्त में ले लिया है जिस वजह से दिन ब दिन गांवों की हरियाली और खुली फिजां संकुचित होती जा रही है, यही वजह है कि इनके प्राकृतिक निवास और भोजन के श्रोत भी खत्म होते जा रहे हैं। बाज, चील, कौवे और परभक्षी बिल्लियां आदि भी गौरैया का काफी नुक्सान पहुंचा रहे हैं। बची खुची कसर पंक्षियों के शिकारी पूरा कर दे रहे हैं। कनेर, बबूल, नीबू, चंदन, बांस, मेंहदी, अमरूद के वृक्षों पर ये अपना घोंसला बनाती हैं। छोटे पेड़ व झाड़ियों को काटे जाने से भी इनके प्रजनन पर संकट मण्डराया है। इसके अलावा मोबाइल के टावर भी इनके वजूद को मिटाने में मदद्गार सबित हो रहे हैं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रो मैगनेटिक किरणें गौरैया की प्रजनन क्षमता को कम करती हैं। जिस वजह से दिन ब दिन गौरैया विलुप्त होती जा रही है। इनका कम होना हमारे पर्यावरण के लिए खराब संकेत है। गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नही बल्कि हमारी मानव सभ्यता का एक अंग है और हमारे गाँव व शहरों में स्वस्थ वातावरण की सूचक भी है। गौरैया किसानों के लिए काफी मदद्गार मानी जाती है, ये अपने बच्चों को जो अल्फा एवं कटवर्म खिलाती हैं, वो फसलों को बहुत नुक्सान पहुंचाते हैं।
गौरेया पासेराडेई परिवार की सदस्य हैं। इनकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। ये अधिकतर झुंड में ही रहती हैं तथा भोजन तलाशने के लिए गौरेया का झुंड अधिकतर दो मील की दूरी तय करते हैं। आवश्यकता है कि हम इस नन्ही चिड़िया को घर बनाने के लिए थोड़ी सी जगह दे और इन्हें माकूल सुरक्षा दें तथा यह अपने बच्चों को आसानी से पाल सके इसलिए विषहीन हरियाली उपलब्ध कराने का प्रयास करें। घरों में नेस्ट बाक्स लगायें। गर्मी के दिनों में घरों, आफिस और सर्वाजनिक स्थलों पर बर्तन में पानी व दाना रखने का प्रबंध करें। हमें इन नन्हीं चिड़ियों के लिए वातावरण को इनके अनुकूल बनाने में मदद करनी होगी। ताकि इनकी मासूम चहक हमारे आस पास बरकरार रह सके। आजकल खेतों से लेकर घर के गमलों के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग हो रहा है जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते है और ना ही इस पक्षी को समुचित भोजन मिल पा रहा है। इसलिए गौरैया समेत दुनिया भर के बहुत से पक्षी हमसे रूठ चुके हैं और शायद वो लगभग विलुप्त हो चुके हैं या फिर किसी कोने में अपनी अन्तिम सांसे गिन रहे होंगे। बदलाव की धारा को हम एकाएक नही रोक सकते हैं मगर इस बदलाव की रफ्तार में भी हम उन्हें भी अपने साथ लेकर जरूर चलने की कोशिश कर सकते हैं जो सदियों से हमारे साथ हैं और मानव सभ्यता उनसे फायदा पाती आयी है।
मानव जब भी अपनी राह से भटका है तब प्रकृति ने उसे किसी न किसी रूप में सन्देश देने का काम किया है मगर वह अपनी बेजा ख्वाहिशों की कोलाहल में उसे नजरअंदाज करता आया है। कुदरत के संदेश को नजरअंदाज करने का भयंकर परिणाम भी उसे झेलना पड़ा है। अकाल, भू-स्खलन बेमौसम बारिश, महामारी इसके उदाहरण हैं। संकटग्रस्त गौरैया को बचाना वक्त की पुकार और दरकार है। बच्चों की उड़ने वाली सहेली, घर-आंगन की चहक और फुदक की हिफाजत के लिए हमें गौरैया के संरक्षण की खातिर हर जतन करने की जरूरत है।

Sunday, March 18, 2018

आज के दिन

स्वागत करिये भारतीय नव वर्ष का


इंसान की जिन्दगी में आने वाला हर नया साल उसके लिए बहुत ही कीमती होता है। बीतते वक्त के साथ बदलता कैलेण्डर हमारे लिए महज तारीख का बदलन नहीं है बल्कि हमारे भूत और भविष्य की दिशा निर्धारण का पैमाना होता है। साल की शुरूवात इंसान की जिन्दगी में उमंग और उल्लास के साथ खुशी लेकर आनी चाहिए न कि हाडकपाती ठण्ड! हम भारतवासी ईसवी सन् के प्रथम दिन यानि एक जनवरी को नये वर्ष के रूप में बड़े धूम-धाम से मनाते हैं। जिसका न तो कोई खगोलीय प्रतिष्ठा है, न प्राकृतिक अवस्था और न ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमी। जनवरी के सर्द मौसम में हाड कपाती ठंड व रक्त संचार जमा कर मनुष्य की गतिशीलता को रोक देता है। पेड़ पौधों का विकास रूक जाता है तथा उनके पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस मौसम में सूरज का प्रकाश भी मध्म पड़ने लगता है। कोहरे के धुंध में सब कुछ धुंधला सा दिखता है। जल के श्रोत बर्फ का चादर ओढ़ लेते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने इसी सब को देखकर नवम्बर 1952 में परमाणु वैज्ञानिक मेघनाथ साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति का गठन किया था। इस समिति में एस. सी. बनर्जी, गोरख प्रसाद, वकील के एल दफतरी, पत्रकार जे. एस. करंडिकर व गणितज्ञय आर. वी. वैद्य थें। समिति ने सन् 1955 में सर्व सम्मती से विक्रमी संवत पंचांग को स्वीकार करने की सिफारिश की। मगर पंडित नेहरू ने ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही सरकारी कामकाज के लिए उयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को ग्रेगेरियन कैलेंडर को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार किया। 
भारतीय नव वर्ष मनाने के लिए सबसे उपयुक्त विक्रम संवती का प्रथम दिन है क्योंकि प्रकृति इस समय शीतलता एवं ग्रीष्म की आतपता का मध्य बिन्दु होता है। जलवायु समशीतोष्ण रहती है। बसंत के आगमन के साथ ही पतझड़ की कटु स्मृति को भुलाकर नूतन किसलय एवं पुष्पों के युक्त पादप वृन्द इस समय प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार करते दिखते हैं। पशु-पक्षि, कीट-पतंग, स्थावर-जंगम सभी प्राणी नई आशा के साथ उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त दिखाई पड़ते हैं। चारों तरफ सब कुछ नया-नया दिखयी पड़ता है। मनुष्य की प्रवृत्ती उस आनन्द के साथ जुड़ी हुई है जो बारिश की प्रथम फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागत में पक्षी के प्रथम गान या फिर नवजात शिशु का संसार में प्रथम आगमन के किलकारी से होता है। 
ऐसा माना जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की याद में इसी दिन राज्य स्थापित कर विक्रमी संवत की शुरूवात की। मर्यादा पुरूषोततम राम के जन्मदिन रामनवमी से नौ दिन पहले मनने वाले उत्सव भक्ति व शक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र का प्रथम दिन तथा लंका विजयोपरान्त आयोध्या लौटे राम का राज्याभिषेक इसी दिन किया गया। यही नहीं शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हुणों को परास्त कर दक्षिण भारत में राज्य स्थापित करने हेतु इसी दिन का चुनाव किया। उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, आन्ध्र प्रदेश में उगादी, महाराष्ट में गुड़ी पड़वा, सिंधु प्रांत में चेती चांद के रूप में नव वर्ष बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इसी दिन को दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना। भारतीय परम्परा व शास्त्र के अनुसार विक्रम संवत का पहला दिन ही भारतीय नव वर्ष के रूप में मनाया जाना उचित व प्रसंगिक है। आइये दिल खोलकर विजय मिश्र बुद्धिहीन की काव्य रचना के साथ भारतीय नव वर्ष का स्वागत करें...
  
  स्वागत तेरा नव विहान
  खेले होठों पर हंसी कली 
  है विहंस रहा सारा वितान
  स्वागत तेरा नव विहान।

 पत्ते पत्ते खुशी मनाए    
 मंद पवन है अंग लगाए
 पलक पाँवड़े बिछा सभी
 हैं विहंग कर रहे मधुर गान
 स्वागत तेरा है नव विहान।

Monday, January 23, 2012

राजनीति

चुनावी दंगल में डान

उत्तर प्रदेश का चन्दौली जनपद धान का कटोरा माना जाता था मगर राजनैतिक व प्रशासनिक उपेक्षा के चलते किसानों के कटोरे से धान सूख गया है। अब इसकी पहचान नक्सली जनपद के रूप में की जाती है। आखिर हो भी क्यों ना? चकिया व नौगढ़ के जंगलों में नक्सलियों के पदचाप की कोलाहल गाहे-बेगाहे सुनायी देती रही है। किसानों की बदहाली व युवाओं की बेरोजगारी के साथ संसाधनों का आभाव प्रमुख वजह है। अगर राजनैतिक परिदृष्य पर गौर फरमाये नतो चन्दौली पचास से सत्तर के दशक के बीच लोकतांत्रिक राजनीतिक चेतना का गढ़ रहा है। यहां से राजनीति की शुरूवात करने वालों ने प्रदेश की राजनीति व सरकार को जहां नेतृत्व प्रदान किया है वहीं यहां विपक्ष की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ भी अपनी अलग पहचान रखते थें। चन्दौली से सन् 1952 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरूवात करने वाले दो राजनीतिक दिग्गज त्रिभुवन नारायण सिंह व पं0 कमलापति त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेष सरकार की बागडोर सम्भाली। समाजवादी आनदोलन के जनक डा0 राममनोहर लोहिया ने सन् 1957 में चन्दौली से चुनाव लड़े व हार गये बावजूद इसके वे क्षेत्र से अपना सम्बंध बनाए रखे।
वैस तो जनपद में चार विधानसभा सीटें हैं मगर परिसीमन के बाद धानापुर व चन्दौली सदर दो विधानसभा सीटों का वजूद समाप्त हो गया है जिसके बाद सैयदराजा व सकलडीहा दो नये विधानसभा सृजित हुए। अब चकिया सुरक्षित के अलावा मुगलसराय, सैयदराजा व सकलडीहा जनपद की चार विधानसभा सीटें हैं। चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है सूबे में तमाम सियासी पार्टियों का चुनावी अभियान जोर पकड़ता जा रहा है। आज पांच दषक बीतने के बाद नये परिसीमन के साथ जनपद की राजनीति भी बदली सी गयी है। तभी तो सैयदराजा विधानसभा में 2012 में होने जा रहे चुनाव में जहां एक तरफ कानून का रखवाला चुनाव लड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ कानून तोड़ने वाला भी चुनावी समर में ताल ठोंकता नजर आ रहा है।


सत्ता की हनक, विधायक की ठाट बाट और रूतबे को देखकर आज राजा से रंक तक को राजनीति का चस्का लग गया है। फिर जरायम जगत के चर्चित चेहरे सियासत का ताज पहनने से पीछे क्यों रहें? षायद यही वजह है कि जरायम की कालिख को सियासी लिबास में सफेद करने के लिए माफिया डान बृजेश सिंह भी सलाखों के पीछे से विधानसभा पहुंचने की जुगत में है। तभी तो वह चन्दौली के सैयदराजा विधानसभा सीट से प्रगतिषील मानव समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहा है। डान के सामने पूर्व डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह भी कांग्रेस पर्टी से चुनाव लड़ रहें हैं। विदित हो कि शैलेन्द्र सिंह ने सपा सरकार में एक माफिया का एलएमजी पकड़े जाने वाले मामले में नौकरी छोड़ दी थी। लोगों में यह चर्चा आम है कि यहां मुकाबला कानून का रखवाला बनाम कानून तोड़ने वाले के बीच है। इसके अलावा सपा, बासपा, भाजपा व निर्दल उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में हैं।
सैयदराजा विधानसभा में जातिगत आंकड़े पर गौर फरमाये तो यहां तकरीबन साठ हजार अनुसूचित जाति/जन जाति, पैतालिस हजार यादव, चालीस हजार राजपूत/भूमिहार, पच्चीस हजार मुसलमान, पच्चीस हजार बिन्द/मल्लाह, पन्द्र हजार ब्राहमण समेत अन्य बिरादरी के मतदाता हैं। ऐसे में वर्तमान पूर्व मंत्री व सदर बसपा विधायक शारदा प्रसाद को अपने कैडर वोट व ब्राहमण मतदाताओ का सहारा है तो सपा के रमाशंकर सिंह हिरन को परम्परागत मुस्लिम-यादव गठजोड, कांग्रेस को राहुल के जादू व शैलेन्द्र सिंह का साफ ईमानदार छवि तो भाजपा के हरेन्द्र राय का हंगाई व भ्रश्टाचार मुददा है। सपा के बागी व निर्दल उम्मीदवार मनोज कुमार सिंह डब्लू को यादव/मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन व स्थानीय प्रतिनिधि व क्षेत्र की बदहाली के मुददे का सहारा, बृजेश सिंह को स्वजातीय मतों के अलावा बिन्द/मल्लाह के समर्थन से चुनावी नैया पार लगाने की जुगत में है। स्वाजातीय उम्मीदवारों से घिरे माफिया डान बृजेश सिंह का सियासी सफर आसान नहीं लग रहा है। इसके साथ भतीजे व धानापुर से बसपा विधायक सुशील सिंह की कारकरदगी का भी सामना इनको करना पड़ सकता है। सूत्रों की मानें तो डान का चुनवी कमान उनका साल, पत्नि व खास लोगों के कंधों पर है। इनके लोग कहीं जाति तो कहीं जान बचाने के नाम पर वोट मांग रहे हैं।


एक तरफ जहां क्षेत्र में बिलजी, पानी, सड़क व स्वास्थ सेवाओं की बदहाली तो दूसरी तरफ गंगा कटान में समाती किसानों के मकान व कास्त की जमीने भी चुनाव के प्रमुख मुददें होंगे। बदहाल किसान, बेरोजगार युवा, बदहाल षिक्षा व्यवस्था भी नेताओं के सामने होगा। पांच साल तक उपेक्षित जनता बदलाव के मूड में है। सियासी जानकारों की मानें तो ऐसे में जबर्दस्त सियासी घमास की उम्मीद है। कडाके की ठण्ड में भी सैयदराजा में सियासी पारा गर्म है। चैराहों-चैपालों में जितनी मुंह उतनी बातों का सिलसिला जारी है। आटकलों और आकलनों बाजार गर्म है। सियासी दंगल में उंट किस करवट बैठेगा लोगों में कयासों का दौर जारी है।

एम. अफसर खान सागर