Saturday, April 2, 2011

शाइनिंग इंडिया!

गुमनामी की कब्रगाह में धरकार

हमें बांस कलाकार कहते हैं
सरकार! हमें धरकार कहते हैं

आज जब हम चाँद और मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं। ग्लोबल विलेज (वैश्विक गाँव) की अवधारणा को अपना रहे हैं। इन्टरनेट में पूरी दुनियां सिमट सी गयी हैं। भारत को 2020 तक विकसित राष्ट्र का दर्जा दिलाने की हाड़ तोड़ मेहनत की जा रही है। वहीं ग्रामीण भारत के मुंह पर धरकार जाति बदनुमा दाग़ साबित हो रही है। बांस की पतली-पतली छिलकों में अपना जीवन तलाशते ये लोग मौलिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से पूरी तरह महरूम हैं। इनका पूर जीवन केवत दो वक्त की रोटी तक ही सीमित है और ये लोग समाज और उसके विकास से पूरी तरह नावाकिफ हैं।
भारत के विकास में बाधक धरकार जाति बंजारों सा जीवन बिता कर दुनियां से कूच कर जाता है और समाज सभ्यता की दुहाई देने वाले लोगों के पास इनके मातम पुर्सी के लिए वक्त भी नहीं रहता है। धरकार जाति के लोग तो शिक्षा और ही भारत सरकार के सामुदायिक विकास की अवधारणा को अपनाने में विश्वास रखते हैं और ही इनके उपर सामुदायिक स्वास्थ मिशन के नारों का प्रभाव पड़ता है। सड़कों के किनारे, बंजर भूमियों पर अवैध कब्जा जमाकर झोपड़ पट्टी की जीवन शैली अपनाने वाले ये लोग विगत 20 वर्षों से स्थानीय कस्बे में सड़क के किनारे जीवन-यापन कर रहे हैं। क्या कभी प्रशासन के उन आला हुक्मरानों को इस बात की तनिक फिक्र हुई कि इन्हे स्थायी निवास मिल सके जो एयर कंडीशन मकानों में ऐश की जिन्दगी गुजार रहे हैं। आये दिन इन बेबसों का सामना मौत के काले पंजों से होता रहता है, कभी तेज रफतार गाड़ीयों का काफीला इनके झोपड़ीयों को रौंदता चला जाता है तो कभी इनके बच्चे सड़क पर खेलते हुए वाहनों का शिकार हो जाते हैं। इन मजलूमों की मौत पर तो समाज के ठीकेदारों को शोक होता है और ही विकास सुविधाओं का राग अलापने वाली सरकारों को।
जहाँ प्रदेश केन्द्र सरकारें ग्रामीण भारत को ढ़ाँचागत विकास उपलब्ध कराने पर कटीबद्ध हैं वही सुविधा के नाम पर धरकार जाति के दिलजोई के लिए भी कुछ नहीं है। रामलाल (60 वर्ष) को तकलीफ केवल इस बात की है कि आज तक उसे वोट देने का राजनैतिक अधिकार भी नहीं मिल पाया है। वे बताते हैं कि ‘‘साहब हमनी के इहाँ रहत 20 बरस बीत गईल राशन कारड मिलल बा अउर वोटवा देवे के खातिर नामै पड़ल बा। हमनी भारत के नागरिक भी ना बानी।’’ प्रशासनिक उपेक्षा से झुब्ध रामलाल को षिकायत ये है कि बीस वर्षों के तवील वक्त बीत जाने के बाद भी वो भारत का नागरिक नहीं बन पाया है।
भारत निर्माण, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय रोजगार गारान्टी योजना और इन्दिरा आवास या महामाया आवास योजना समेत दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं से वंचित धरकार समुदाय का केवल दो वक्त की रोटी के लिए हाड़-तोड़ मेहनत करना इनकी नियति बन गयी है। शिक्षा के नाम पर इनके पास केवल काला आक्षर भैंस बराबर है। सोखा (55 वर्ष) बताते हैं कि ‘‘बाबू जी लड़कवा-लड़कीयन नमवे ना लिखल जाला, मास्टर जी कहेलन की का होई पढ़ा लिखा के जा कुल डगरी बनावा दु पैसा आदमी बना।’’ ऐसा हो भी क्यों , कहाँ से मास्टर जी इनका निवास प्रमाण-पत्र लावें तथा कहाँ से इनको भारत की नागरिकता प्रदान करें। अक्सर इन कारणों और आर्थिक परेशानियों की वजह से इनके बच्चे चाहते हुए भी शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह जाते हैं। यही कारण है कि सर्व शिक्षा अभियान-सब पढ़ें और सब बढ़ें असफलता का मुंह देख रहा है और केवल कागजों पर ही सिमट कर रह जा रहा है।


भारत सरकार के अनुसूचित जाति का गोल्ड मेडल लिए धरकार समुदाय आज जीवन की रेत पर बे मकसद लकीरें खींचता नज़र रहा है। तो इन्हे इनके जीवन का आगाज ही पता है और ही अन्जाम का। ये क्यों जिन्दा हैं ? इनके जीवन का मकसद क्या है ? कभी इन सवालों पर विचार करने की इन्होने जहमत ही नहीं उठायी। कमाना और खाना बस यही एक मकसद है इनके जीवन का। इन्हे तो जीवन के भूत पर पष्चाताप और ही भविष्य की चिन्ता रहती है। चमक-दमक, फैशन से दूर ये लोग साधारण जीवन शैली अपना कर गुमनामी के घटाटोप अन्धेरे में जीने पर विवष हैं। फैशन के नाम पर मर्दों के पास फटी लुंगी और शरीर पर केवल मैला-कुचैला बनियान ही काफी है तथा औरतें साड़ीयां पहन कर बालों में तेल चुपड़े नजर आती हैं। गोपाल (65 वर्ष) ‘‘साहब दो जून की रोटी नसीब हो जाये उहे बड़ी बात बा फैशन करके का होई।’’ लाचारी और मायूसी इनके चेहरों पर साफ झलकता है। कैमरे की चमक से आहलादित ये लोग मौन निगाहों से किसी राहत की उम्मीद करते हैं। फिर बिफर पड़ते हैं ‘‘का बाबू जी कौनों सुविधा सरकार देत बा का, हमनी के खातिर कुछौ ना होई का’’ और अपने काम में मशगूल हो जाते हैं।
धरकार जाति के विकास पर गौर फरमाने पर पता चलेगा कि आँकड़े बाजी में माहिर प्रषासन विकास की झूठी खोखली राग अलापती नजर आयेगी। प्रशासन के जिम्मेदार लोग दीमक की तरह इनकी सुविधाओं को चाटने में माहिर हैं। अशिक्षित और गैर जानकार समाज अपने हक़ की लड़ाई भी लड़ पाने में असमर्थ है। मूलभूत सुविधाओं से महरूम ये समाज भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वछता मिशन, ग्रामीण स्वास्थ मिषन समेंत विभिन्न सरकारी योजनाओं को कुन्द करने पर तुला हैं। इनके पास निवास के रूप में जहाँ सिर्फ झोपड़ पट्ट है, वहीं शैचालय तो दूर सोने के लिए खाट तक मौजूद नहीं है। स्नान की बात तो दूर है पीने के लिए इनके पास स्वछ जल भी सम्भव नहीं है। यही वजूहात है कि ये लोग अक्सर महामारी की चपेट में बड़ी आसानी से जाते हैं। कीड़े-मकोड़ों सा जीवन बीताने वाले ये लोग समाज सरकार से क्या उम्मीद लगायेंगे ? अन्धी बहरी सरकारें इनके करूण क्रन्दन पर कब ध्यान देती है ? कौन मसीहा बन कर आयेगा इनके आवाज़ को उठाने वाला ? तमाम ऐसे अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका उत्तर शायद ही प्रशासन के आला हुक्मरानों के पास हो एवं समाज के ठेकेदारों तथा लाषों पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले राजनेताओं के पास।
कैसे सफल होगा 2020 का मिशन ? कैसे भारत विकसित राष्ट्र बनेगा ? क्या भूखा, नंगा और अशिक्षित भारत विकास कर पाने में सफल हो पायेगा ? तमाम ऐसे प्रष्न सामने यक्ष रूप लेकर उत्पन्न हो जायेगा जब धरकार जाति की मुफलिसी पर बरबस निगाह पड़ेगी। अगर हमें विकास की कल्पना भर करना हो तो राष्ट्र के हर व्यक्ति समुदाय के बारे में सोचना होगा तथा विकास की अन्धी दौड़ में हमें सभी को साथ लेकर चलना होगा अन्यथा विकास राष्ट्र के लिए दिवास्वप्न बन कर रह जायेगी तथा गुमनामी की कब्रगाह में जाता धरकार समुदाय एक एक दिन राष्ट्र के लिए घातक भयंकर जख़्म के रूप में सामने खड़ा हो सकता है, जैसा कि आज नक्सलवाद है ?

2 comments:

  1. Bahut umda lekhni...
    satik bisay ka chayan..

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  2. बेवकूफ डोमो को धरकार साबित करने के वहसी लेख लिखते हो मुर्ख हो तुम जो धरकार जाति के सडक पर बसने वाले डोमो से तुलता कर रहे हो प्रो० सब्द लगाकर अपने अज्ञानता का परिचय दे रहे हो । धरकार जाति कुम्हार लुहार धोबी के तरह एक हथकरखा उद्‍योग केा विकसित करने वाली जाति है । जो सख्या बल कल के कारण एस०सी० कैटेगरी में आति है।

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