Monday, October 24, 2011

पुस्तक लोकार्पण

वेदना से जन्म लेती है कविता



नागरी प्रचारिणी सभा वारणसी के पं0 सुधाकर पांडेय स्मृति कक्ष में आयोजित संगोष्ठि मेंदर्द की है गीत सीताकाव्यपुस्तक का लोकार्पण करते हुए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो0 राधेश्याम दुबे ने कहा कि प्रसंग बदल जाने से षब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए जब पौराणिक प्रसंग काव्य रचना के लिए उठाये जाते हैं तो रचनाकार से बड़ी सावधानी की अपेक्षा की जाती है। मां सीता आधुनिक नारी विमर्श के संदर्भ में उद्धृत तो की जा सकती हैं किन्तु उसका माध्यम नहीं बन सकती।
संगोष्ठि के अध्यक्ष डा0 कमलाकान्त त्रिपाठी ने कहा कि कविता का जन्म वेदना से होता है। पुस्तक का रचनाकार जिन संघर्षों से होकर गुजरा है उनके आलोक में ही कृति का समुचित मुल्यांकन किया जा सकता है। कला पक्ष की दृष्टि से भी काव्य महत्वपूर्ण है।


विशिष्ठ
अतिथि गीतकार श्रीकृष्ण तिवारी ने कहा कि रचनाकार का लोक जितना बड़ा होगा उसी अनुपात में वह लोकमान्यता का अधिकारी होता है। लोक की संवेदना को अनुभूति के धरातल पर जीने की क्षमतादर्द की है गीत सीताके रचनाकर के भीतर दिखलाई पड़ती है।
डा0 रामअवतार पांडेय ने कहा कि कविता के लिए भावना और हृदय की पूंजी जरूरी है और वह पेशे से इंजिनीयर विजय कुमार मिश्र के भीतर दिखलाई पड़ती है। विष्व के महानतम नारी चरित्र सीता की वेदना को आधार बना कर उन्होने नारी विमर्श के विचारणीय सूत्रों को अपनी इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
लोकार्पण गोष्ठी में सर्वश्री शिवप्रसाद द्विवेदी, एल0 उमाशंकर सिंह, रामकृष्ण सहस्रबुद्धे, एम. अफसर खां सागर, विनय वर्मा, डा0 संजय पांडे, रूद्र प्रताप रूद्र, राम प्रकाश शाह, श्रीमती वत्सला और डा0 पवन कुमार शास्त्री ने भी विचार व्यक्त करते हुए रचनाकार को बधाई दी।
प्रारम्भ में आगंतुकों का स्वागत करते हुए रचनाकार विजय कुमार मिश्रबुद्धिहीनने कहा कि इंजिनीयरिंग क्षेत्र में कार्य करते हुए अतिषय सुख-दुःख और रागात्मक संवेदना के क्षण जब प्राप्त हुए तब अपने भीतर जो अनुभूतियां व्यक्त हुईं उन्होनें अनायास कविता का रूप ले लिया।
धनयवाद प्रकाश समजीत शुक्लने, संयोजन ब्रजेश पांडेय ने तथा संचालन डा0 जितेन्द्र नाथ मिश्र ने किया।


Friday, September 23, 2011

रेलवे का राजभाषा पखवारा-2011 सम्पन्न


जख्म तो मिलते हैं पर दवा नहीं मिलती


पूर्व मध्य रेलवे मुगलसराय मण्डल के प्लांट डिपो इंजिनीयरिंग कारखाना के तत्वाधान में 14 से 21 सितंबर तक हिन्दी पखवारा-2011 मनाया गया। पखवारा के समापन समारोह में 21 सिंतंबर को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्द प्रदर्शनी, गीत-संगीत कवि सम्मेलन शामिल है।


कवि सम्मेलन का आगाज मुख्य कारखाना प्रबन्धक राजेश कुमार अग्रवाल ने मां सरस्वती के तैलचित्र पर माल्यर्पण द्वीप प्रज्जवलित कर किया। इसके बाद गोरखपुर दूरदर्शन के मोहन तिवारी ने सरस्वती वंदना सहित विभिन्न भजनों से दर्शकों का मन मोहा। कार्यक्रम की अगली कड़ी में युवा कवि शायर एम. अफसर खांसागरने अपनी रचना आजकल के लोगों में वफा क्यों नहीं मिलती, जख्म तो मिलते हैं मगर दवा नहीं मिलती महलों में रहने वाले फुटपाथों का दर्द जाने, बदहाली की इस सुरत को कैसे भला विकास लिखूंगा सुनाकर वर्तमान सामाजिक परिवेष पर कटाक्ष किया। कवि विजय बुद्धिहीन ने हिन्दी हिन्दुस्तान हमारा हमको है प्राणें से प्यारा और मुस्लिम फकीर, पीर ने काषी को संवारा; तुलसी, कबीर, सूर ने अल्लाह को पुकार सुनाकर समप्रदायिकता पर करारा प्रहार किया। वाराणसी से आये नागरी प्रचारणी पत्रिका के संपादक ब्रजेष चन्द पाण्डेय ने जहां गांधी को भी गोली मारी गयी; कोई अन्ना हजारे को क्या समझाए, भ्रष्टाचार की जड़ तो इस हिमालय में है किसी की हिम्मत है जो इस हिमालय पर आये सुनाया। इलाहाबाद से आये हास्य कवि डा0 अनिल चौबे ने जितनी दाल रोटी पाकिस्तान खाता है; उतनी की बिहारी खैनी थूक देते हैं लालू राबड़ी जो इस्लामाबाद चले जायें तो इस्लामाबाद भैंस का तबेला बन जाएगा और पाक की हिना है कभी रांग नहीं ला सकेगी, हाथ लगाओगे विस्फोट कर जायेगी सुनाकर श्रोताओे को हंसे पर मजबूर कर दिया।


इस दौरान राजेश कुमार अग्रवाल ने उपस्थित लोगों से आहवाहन किया कि हम अपनी राज भाषा को दिल से अपनायें। हिन्दी हमारी सभ्यता संस्कृति से जुड़ी है। इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। अब वक्त गया है कि हिन्दी का विस्तार विष्व स्तर पर किया है। प्लाण्ट डिपो के अधिशासी इंजिनीयर विजय कुमार मिश्र ने आये हुए लोगों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

Thursday, August 18, 2011

सैर

प्रकृति के अनमोल नजारों का हसीन सफर




सैर कर दुनियां की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां
गर जिन्दगानी भी रही तो ये जवानी फिर कहां!

आप अगर चाहते हैं कि प्रकृति के अनमोल नजारों, इतिहास तिलिस्म के स्वर्णिम यादों के सफर का लुत्फ उठाना तो एक बार जरूर चकिया की जानिब रूख करिए। यहां आपकों मिलेगा चन्द्रकान्ता की अमर प्रेम कहानी की निशानियां राजदरी, देवदरी और विन्दम्फाल जैसे मनमोहक जल प्रपात। गहडवाल राजपूत राजवंश के स्वर्णिम इतिहास भी विंध्य पर्वत श्रृंखला की इन्ही पहाड़ियों में ध्वंसावशेष के रूप में बिखरे पड़े हैं। दरअसल विंध्यपर्वत श्रृंखला की गोद में बसा उत्तर प्रदेश का जनपद चन्दौली की चकिया तहसील अपने गोद में जाने कितने रहस्य और तिलिस्म दफन किए है।



बात अगर जल प्रपातों जलाषयों की हो तो चकिया के औरवाटांड ग्राम के पास कर्मनाशा नदी पर 58 मीटर उचां सुन्दर जल प्रपात है जिसे बड़ी दरी के नाम से जाना जाता है। इसी समीप नौगढ़ बांध का निर्माण सन् 1957-58 में हुआ है, जिसका क्षेत्रफल 19.6 वर्ग किलोमीटर में है। जिसका पानी एक-दूसरे बांधों से जुडे मूंसाखाड़ लतीफशाह जलाशयों में जाता है। यहां का नजारा बेहद हसीन सुहाना होता है। दूसरी नदी चन्द्रप्रभा है जिसका उद्गम स्थल पडोसी जनपद मिर्जापुर में है, यह नदी पहाड़ी मार्ग से लहराती बलखाती हुई दो जल प्रपातों देवदरी राजदरी के बीच से तकरीबन 400 फीट नीचे उतरती है। इन प्रपातों का दृष्य अत्यन्त आकर्षक एवं मनोहारी होने के कारण आमोद-प्रमोद की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिसकी वजह से बारिश के मौसम में पर्यटकों का जमावडा देखने को मिलता है।

Monday, August 8, 2011

सिर्फ याद बाकी


चली गयीं कोटला साहब...

मौत जिंदगी का वक्फा है

यानी आगे चलेंगे दम लेकर।

आज सुबह के वक्त हमारा पूरा परिवार जब सेहरी की तैयारी में था कि अचानक सालों से बीमार हमारी नानी जाहिरून निशा इस फानी दुनियां से भोर के तीन बजकर पांच मिनट पर कभी ना खत्म होने वाली दुनियां में चली गयीं। मौत जोकि शश्वत सत्य है। इस पर किसी का जोर नहींए क्या राजा क्या रंक सब एक समान। नानी कैंसर से पिछले दस सालों से बीमार थी मगर उसने कभी तकलीफ को जाहिर नहीं किया।

मैं अक्सर उसे कोटला साहब कहके पुकारता था वो खुश हो जाती। पूछने पर की ऐनी प्राब्लम तो कहती नो प्राब्लम। जिंदगी की तमाम तल्खियें से गुजरने के बाद भी नानी ने कभी दुख का इजहार तक नहीं किया। आज हम उन्हे सुपुर्दे खाक कर आयें। सुपुर्दे खाक किया अपने अरमानों को, अपनी खुशियों को। मैं अभी सोच रहा हूं अब कहां मिलेंगी कोटला साहब। किससे कहूंगा कि आज मुझे कुत्ते ने सींग मार दिया। किससे पूछूंगा कि खजूरिया साहब कहां है। आज दिल रो दिया कोटला साहब को याद कर के। आखिर मौत ही सच है बाकी सब झूठ। अब तो यादें ही बाकी हैं कोटला साहब की। कोटला सहब माफ करीयेगा अगर मुझे कुछ खता हुई होगी।

अल्लाह हाफिज कोटला साहब।

शायद अब कभी ना मिल सकुं की पूछुं जर्मन साहब कैसे हैं?

खुदा आपको जन्नत में जगह दे।

मुठठीयों में खाक लेकर दोस्त आए वक्त-ए-दफन

जिन्दगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे।

Monday, July 11, 2011

Main aur Mera Idol


Navbharat Youth World Ne
12 Julye ke ank me Mujhe
Main aur Mera Idol
Ratan Tata ji ke saath Chuna hai.

मीडिया के लोगों का साथ मिले

हिन्दी जर्नलिस्ट असोसिएषन ने मुझे उत्तर प्रदेष का संयोजक मनोनीत किया है। मैं कोषिष करूंगा कि सभी मीडिया के लोगों का साथ मिले और हम अपने अधिकार को पा सकें।

Monday, June 27, 2011

संगोष्ठी

'सरस्वती सुमन' के लघु कथा विशेषांक का विमोचन

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाचेतनाके तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे.

कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है


संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.

अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार बुद्धिजीवी उपस्थित थे.