Saturday, March 12, 2016

आखिर क्यों पैदा होने से पहले दफ्न हो रही हैं बच्चियां ?

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुल्क में सख्त कानून होने के बावजूद मासूम बच्चियों को पैदा होने से पहले ही दफ्न करने के मामले बदस्तूर जारी हैं। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान भी चल रहे हैं मगर उनका व्यापक असर आना बाकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कन्या भ्रूण हत्या को मुल्क की मानसिक बीमारी तक बता दिया फिर भी लोग नहीं चेत रहे। धर्म चाहे कोई हो स्त्री को मां, बहन और बीबी का दर्जा हासिल है बावजूद इसके सामाजिक रूढि़वादीता ने हमें न जाने कितना गिरा दिया है। भारतीय संस्कृति में स्त्रीयों की पूजा की जाती है फिर भी पुत्र प्राप्ति की चाह में आज भी कई कन्याएं जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दी जा रही हैं। बालिकाओं पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ सरकारी तंत्र के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को इसके लिए आगे आना होगा। महिला सशक्तिकरण का परचम बुलन्द करने से पहले बालिकाओं को बचाने की जरूरत है, क्योंकि जब बालिकाओं ही वजूद खतरे में रहेगा तो ऐसी दशा में महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। महिलाओं पर होने वाले अपराधों की पहली शुरुआत कन्या भ्रूण हत्या से होती है। चिंताजनक और विचारणीय तथ्य है कि हमारे मुल्क के संवृद्ध राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ती गैरकानूनी, अमानवीय और घृणित है। इसके खिलाफ समाज को पुरजोर आवाज बुलन्द करना होगा। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या-भ्रूण हत्या की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। अगर आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो सन् 1981 में 0.6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में यह आंकड़ा 1000-927 हो गया। सन् 2016-17 तक इसे इसे बढ़ा कर 950 करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। एक आंकड़ा के मुताबिक हमारे देश में प्रतिवर्ष करीब 40 लाख महिलाएं गर्भपात करवाती हैं। हालांकि कन्या भ्रूण हत्या के लिए गर्भपात तो प्रमुख वजह है ही इसके अलावा कन्या मृत्यु दर का अधिक होना भी प्रमुख वजह है। जिससे साफ जाहिर होता है कि बच्चों की अपेक्षा बच्चियों की देख-भाल ठीक तरीके से नही होने से कन्या मृत्यु दर ज्यादा है।
कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए मुल्क में कानून की कमी नहीं है। इसको रोकने के लिए कई कानून व एक्ट बने हैं। सन् 1995 में बने “जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम, 1995 (प्री नेटन डायग्नोस्टिक एक्ट, 1995)” के मुताबिक बच्चे के जन्म से पूर्व उसके लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 के अन्र्तगत गर्भाधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले ‘कन्या भ्रूण हत्या’ के लिए लिंग परीक्षण करने को कानूनी जुर्म ठहराया गया है। इसके साथ ही गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1971 के अनुसार केवल विशेष परिस्थितियों में ही गर्भवती स्त्री अपना गर्भपात करवा सकती है। जब गर्भ की वजह से महिला की जान को खतरा हो या महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को खतरा हो या गर्भ बलात्कार के कारण ठहरा हो या बच्चा गंभीर रूप से विकलांग या अपाहिज पैदा हो सकता हो। आईपीसी में भी इस सम्बंध मंे प्रावधान मौजूद हैं। आईपीसी की धारा 313 में स्त्री की सहमति के बिना गर्भपात करवाने वाले को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इन सबके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या के मामले दिन-ब-दिन बढ़े ही जा रहे हैं। पुत्र रत्न की प्राप्ति के नशे में चूर पिता और कन्या भ्रुण हत्या के लिए तैयार महिलाएं भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कानून कमजोर नहीं है और सजा का प्रावधान भी पर्यपात है। मगर डाक्टरों की एक जमात जो लालच में सोनोग्राफी के जरिए लिंग निर्धारण करके जन्म से पहले ही कन्याओं के कत्ल में बढ़ी भूमिका अदा कर रही है। हालांकि इसके लिए सख्त कानून हैं फिर भी कहीं न कहीं कानून के अनुपालन एवं सम्बन्धित व्यक्तियों में इच्छा शक्ति की कमी की वजह से ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही हो पाने में बाधा उत्पन्न होती जतर आ रही है।
कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने वाले कारणों पर चर्चा किए बिना इसके निदान पर पहुंचना बेमानी होगा। सभ्य और शिक्षित समाज में दहेज लोभी भेडि़ये कन्या भ्रूण हत्या को फैलाने में काफी हद तक मददगार साबित हुए हैं। सुरसा की तरह मुहं बाये महंगाई और गरीबी में  इंसान का अपने परिवार का पेट पालना मुश्किल साबित हो रहा है एसे में उसे दहेज की चिंता ने कन्याओं से मोहभंग कर रखा है। इस भेद-भाव के पीछे सांस्कृतिक मान्यताओं एवं सामाजिक नियमों की भूमिका से इंकार नही किया जा सकता है। पिता के बाद पुत्र पर ही वंश आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होती है, माता-पिता को मुखाग्नि देने की परम्परा आदि। कन्या भ्रूण हत्या में पिता और परिवार की भागीदारी से ज्यादा चिंता का विषय है इसमें मां की सहमति। एक मां जो खुद स्त्री होती है, वह कैसे अपने ही अस्तितव को नष्ट कर सकती है और यह भी तब जब वह जानती हो कि वह बच्ची भी उसी का अंश है। कभी-कभी औरत ही औरत के ऊपर होने वाले अत्याचार की धुरि बनती है, इस कथन को ऐसे परिदृश्य में गलत नहीं साबित किया जा सकता है। स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचार की खबरें सदैव ही सुर्खियां में रहती हैं, मगर जितनी स्त्रियाँ बलात्कार, दहेज और दूसरी मानसिक व शारीरिक अत्याचारों से सताई जाती हैं, उनसे कई सौ गुना ज्यादा तो जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं। आज जरूरत है कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सामाजिक जागरूकता पैदाकर लोगों को लकड़ा और लड़की में पनपे फर्क को दूर करने की। इस बात को समझाने की सख्त आवश्यकता है कि लड़कीयां किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं। राजनीति, व्यवसाय, नौकरी, शिक्षा, खेल, सिनेमा, कला सहित दूसरे क्षेत्रों में ये किसी से कम नहीं हैं। आज महिलायें उन सभी उपब्धियों को पाने में सक्षम हैं जो पुरूष हासिल कर सकते हैं। प्रतिभा देवी पाटिल, सोनिया गांधी, जयललिता, आनन्दी बेन, मायावती, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, मैरीकाम, इन्दिरा नूई, चन्दा कोचर, सुनीता विलियम्स सहित अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। इन महिलाओं ने समाज को दिशा देने का काम किया है। ये चन्द उदाहरण हैं जो लड़की और लड़का के फर्क को मिटाती है। अगर हम समाज की छोटी ईकाइ परिवार से ही बच्चियों और महिलाओं को बराबरी का हक दे ंतो ये लड़कों और पुरूष से कहीं कम साबित नहीं होंगी। रूढि़वादी मानसिकता से उपर उठकर हमें बच्चा और बच्ची के फर्क को मिटाना होगा। ये समझना होगा कि 21वीं सदी में हम किस दिशा में जा रहे हैं? हां, धर्म और समाज की मान्यताओं को सुरक्षित रखते हुए इन्हे जीने की पूरी आजादी देनी होगी। अगर बच्चियों का वजूद यूं ही मिटता रहा तो हम बेहतर बीबी, बहन और मां कहां से लाएंगे? कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सबसे पहले महिलाओं को आवाज बुलन्द करना होगा। इसके साथ समाज के नजरिए में व्यापक बदलाव लाने की जरूरत है वर्ना ऐसे ही पैदा होने से पहले बच्चियां दफ्न होती रहेंगी।
प्रकाशित- सम्पादकी हिन्दी दैनिक, खबर विजन, वाराणसी
दिनांक- 17 जनवरी 2016

Sunday, May 12, 2013

आखिर क्यों?






उजालों ने उसी को निशाना बनाया है
तारीकीयों ने जिसे हरदम सताया है

वक़्त के औराक़ दिन--दिन मैले होते जा रहे हैं
हिन्द की बेटियों को दरिन्दों ने निशाना बनाया है

चलती बस में आबरू लूटी गई तो क्या हुआ
घर की दहलीज पर भी उन्हे तड़पाया गया है

मां, बहन, बीबी सबको प्यारी है
फिर भी बेटियों को कोख में मारा गया है

घर की जीनत उन्ही से है, ऐसा लोग कहते हैं
फिर जाने क्यों उन्ही पे सितम ढ़ाया गया है

मां के क़दमों में जब जन्नत की बशारत हैसागर
अखिर क्यों हर दौर में औरतों को ही सताया गया है।।

Wednesday, February 13, 2013

प्रेम दिवस

इस प्यर को मैं क्या नाम दूं
वेलेंटाइन डे या यूं कह लें कि प्रेम दिवस
प्यार करने का दिन या प्रेम के इजार करने का दिन या कुछ और?
मेरी समझ से परे....
आखिर प्यार तो प्यार होता है चाहे वह मां से हो,  भाई से या किसी और से!
प्रेम में प्रदर्शन या दिखावा करने की क्या जरूरत है। प्यार तो प्यर है बस प्यार!
कई दिनों से प्रेम दिवस का चिल्ल-पों सुनाई और दिखाई दे रहा है। फेसबुक पर या अखबारों में, वो भी एक खास तबके के बीच या यूं कह लें कि युवाओं में वो भी कस्बाई इलाकों की बनिस्बत शहरों नगरों में ज्यादा है।
आखिर प्रेम सिर्फ युवाओं को ही करना चाहिए या सबको यह सवाल भी मेरे जेहन में कई दिनों से कौंध रहा है। प्रेम दिवस होना चाहिए मैं भी इसके पक्ष में हूं और आज के परिवेश में इसकी सख्त जरूरत है मगर इसका मकसद सिर्फ चन्द लोगों को अपने निजी ख्यालात व इजहारात जाहिर करने की बजाय अवाम के अन्दर आपसी अखलाक पैदा करना हो। चन्द रोजा रिश्ता बनाने व उसका नाजायज इस्तेमाल करने के वास्ते एक लड़का व एक लड़की वेलेंटाइन-डे मनाये तो यह प्यार का मजाक उड़ाने के सिवा कुछ नहीं हो सकता। आज समाज को जरूरत है प्यार के बुनियादी मतलब समझने का। क्या कहता है प्यार? इसके जाने बिना इसका मजाक उड़ाना बेहद अफसोसनाक है। मीरा ने भी प्यार किया था, गोपियों को भी प्यार था मगर उन्हे किसी वेलेंटाइन-डे की दरकार नहीं थी!
आज जरूरत है प्यार को सच्चे दिल से अपनाने की, प्यार के सतरंगी फूल सबके दिलों में खिलाने की। प्यार के कोमल एहसासों को बिखेरने पुष्पित-पल्लवित करने का दिन अगर वेलेंटाइन-डे बने तो सार्थक होगा वर्ना सिर्फ और सिर्फ चोचलों व ढकोसलों से ज्यादा वेलेंटाइ-डे नही हो सकता।

Sunday, November 11, 2012

सागर उवाच

कैटल क्लास की दीवाली

 

शाम के वक्त चैपाल सज चुकी थी। रावण दहन के बाद मूर्ति विसर्जित कर लोग धीरे-धीरे चैपाल की जानिब मुखातिब हो रहे थे। दशहरा वाली सुबह ही काका ने जोखन को पूरे गांव में घूमकर मुनादि का हुक्म दे दिया था कि सभी कैटल क्लास के लोग विसर्जन के बाद दीवाली के बाबत चैपाल में हाजिर रहें। काका पेशानी पर हाथ रख कर शून्य में लीन थे कि जोखन ने आत्मघाती हमला बोल दिया... कौने फिकिर में लीन बाड़ा काका, चुप ससुरा का धमा चैकड़ी मचा रखले बाड़े... काका ने जोखन को डांटते हुए कहा। माहौल धीरे-धीरे धमाकों की गूंज में तब्दील हो चुका था। लोगों की कानाफूसी जोर पकड़ चुकी थी ऐसे में जोखन तपाक से बोल पड़ा... हे काका! अबकी दीवाली पर न त चाउर-चूड़ा होई नाहीं त घरीय-गोझिया क कउनो उम्मीद बा फिर तू काहें दीवाली के फिकिर में लीन बाड़ा। जोखन की बात से पूरा चैपाल सहमत था। माहौल में सियापा छा चुका था सभी लोग काका की तरफ ऐसे ध्यान लगाए बैठे थे मानो वो गांव के मुखिया नहीं मुल्क के मुखिया हों।
बात अगर त्यौहारों की हो तो उसमें चीनी का होना वैसे ही लाजमी है जैसे ससुराल में साली का होना वर्ना सब मजा किरकिरा। काफी देर बाद काका ने चुप्पी तोड़ी... प्यारे कैटल क्लास के भाईयों अबकी दीवाली में चीनी, चावल, चूड़ा, तेल, घी, मोमबत्ती व दीया में सादगी के लिए तैयार हो जाइए। बदलते वक्त के साथ हमें भी नई श्रेणी में रख दिया गया है, जहां हम पहले जनता जर्नादन की श्रेणी में थें मगर अब कैटल क्लास में आ गये हैं। ...तो अब हमें चीन, चावल, चूड़ा, गुझिया की जगह घास-भूसा, चारा से काम चलाना होगा ? जोखन ने सवाल दागा। आपने सही समझा... मैडम व सरदार जी के दौर में हमें नतीजा तो भुगतना ही पड़ेगा न! चीनी इस त्यौहारी मौसम में मीठान न घोलकर हमसब के घरों में जहर घोलने पर जो आमादा है। ऐसे में घरीया व गुझिया के कद्रदानों को चीनी की बेवफाई से शुगर का खतरा भी कम हो गया है। तभी तो पास बैठे अश्विनी बाबू ने एक मसल छेड़ी-

जश्न-ए-पूजा, जश्न-ए-दीवाली या फिर हो जश्न-ए-ईद
क्या मनाएंगे इन्हे? जो हैं सिर्फ चीनी के मूरीद।

माहौल में कुछ ताजगी का एहसास हुआ फिर बात आगे बढ़ चली। हां तो कैटल क्लास के भाईयों इस दीवाली हमारे घरों में अंधेरे का काला साम्राज्य ठीक उसी तरह कायम रहना चाहिए जैसे केन्द्र में यूपीए व वैष्विक बाजार में मंदी तथा हमारे मुल्क में महंगाई का है। सो हम सब सादगी का परिचय देने हुए न तो तेल-घी का दीप जलायेंगे न ही कैंडील। इस बार दीप नहीं दिल जलेंगे खाली, सादी होगी अपनी दीवाली।
हां तो कैटल क्लास के भाईयों आप पूरी तरह से तैयार हो जाएं अबकी दीवाली में घास-भूसा और चारा का लुत्फ उठाने के लिए तबेले के घुप अंधेरे में दीवाली को मनाने के लिए। हे काका... चारा त लालू भईया चाट गईलन, जोखन के इस सवाल पर चैपाल का माहौल धमाकाखेज हो गया। कानाफूसी व बतरस के बीच कोई कहता... अरे भाई कैटल क्लास में भी मारा-मारी है तो कोई लालू को कोसता, बात निकली है तो दूर तलक जायेगी सो काका ने माहौल को किसी तरह दीवालीया बनाया। महंगाई और मंदी का दौर है हम सबकी तो दीवाली सादी मनेंगी मगर कोइ शहर में जाकर भल मानूसों की दीवाली भी देखा है कैसे मनती है उनकी दीवाली? भौचकियाए लोग आपस में खुसर-फुसर करने लगे। सबकी निगाह अश्विनी बाबू पर जा टिकी। वहां तो हर रोज ही दशहरा, दीवाली मनता है काका। शहर में माल, बीयर बार, रेस्तरां, होटल आदि जगहों पर हमेशा होली व दीवाली का माहौल रहता है क्योंकि वहां आमदनी पैसा-रूपया नहीं डालर-पाउंड में होता है। तो वहां न दीवाली मनेगी कि यहां सूखे नहर व अकाल के माहौल में। फिर अश्विनी बाबू ने फरमाया-

कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया
बात निकली है तो हर इक बात पे रोना आया।

इसके बाद चैपाल में काका का फैसला आया... अबकी दीवाली हम कैटल क्लास के लोग न तो चूड़ा-घरिया के चक्कर में रहेंगे ना ही दीया-बाती के। पूरे सादगी के साथ मनेगा दीवाली। न पटाखा, न धमाका सिर्फ और सिर्फ सियापा व सन्नाटा। शास्त्री व बापू के आदर्शें पर चलकर मंत्रीयों व संतरीयों को करारा जवाब देना है। सादगी का लंगोट पहनकर मैडम, मनमोहन व महंगाई का मुकाबला करना है! न पकवान, न स्नान और न ही खानपान। खालीपेट रहकर देश की अर्थव्यवस्था को सुधारना है साथ ही शुगर व शरद बाबू के प्रकोप से भी बचना है। रात में घुप अंधेरा रहे ताकि आइल सब्सीडी का बेजां नुक्सान न हो। दीप की जगह दिल जलाना है, सादगी से दीवाली मनाना है। इसके लिए कैटल क्लास के लोग तैयार हैं ना...? काका के आह्वाहन पर सबने हामी भरी। रात के स्याह तारीकी में जलते दिलों के साथ घर की जानिब कैटल क्लास के लोग हमवार हुए।

                                                                                                                     एम. अफसर खां सागर

Saturday, November 10, 2012

शहर-ए-बनारस

इतिहास से सामना....
1773 ई0 में निर्मित लाला खां का रौजा या मकबरा वाराणसी, उ0प्र0 के राजघाट स्थित मालवीय पुल के निकट एक बड़े आयताकार आंगन जिसके चारों तरफ मीनारें हैं बीच में स्थित है। यह एक गुंबद के आकार का विशाल भवन है। जिसकी छत को रंगीन ग्लेज्ड टाइल्सों से सजाया गया है। यह भारत के प्राचीन सभ्यताओं के अवशेषों में से एक है।
 
लाला खां रौजा, राजघाट, वाराणसी।

लाला खां रौजा, राजघाट, वाराणसी।

लाला खां रौजा, राजघाट, वाराणसी।

लाला खां रौजा, वाराणसी के आंगन में खुदाई के दौरान मिले अवशेष।

लाला खां रौजा, वाराणसी का मुख्य द्वारा।

लाला खां रौजा, वाराणसी के मुख्य द्वारा पर नक्काशी।

लाला खां रौजा, वाराणसी के मुख्य द्वारा पर अरबी भाषा में लिखा शिलापट्ट।

लाला खां रौजा, वाराणसी में निर्मित मीनार।

लाला खां रौजा से मालवीय पुल का नजारा।

Wednesday, October 24, 2012

मेला

विजयादश्मी का मेला....

मेले में केला

मेले में पकौडी
मेले में मिट्टी के खिलौने   
मेले में कोका कोला
मेले में गूड की जलेबी
मेले में रेली का रेला  
स्थान- दश्मी का पोखरा, धानापुर , जनपद-चन्दौली।
.... मेला, केला और झमेला, इन तीनों का अजीब संयोग है।
आखिर कैसे आप सोचते होंगे, तो सुनिए आप मेले में जाएं और केला ना देखें ये सम्भव नहीं, अगर केला दिख गया और मोल भाव में झमेला ना हो तो कहिएगा !
अरे भाई गांव का मेला गांव के लोग और उसमें औरतों का मजमा फिर बन गई बात। शाम के चार बजे एक भाई साहब ने फोन किया पांच साल से हमने मेला नहीं देखा चलिए देख आएं। मैं भी राजी हो गया। हम लोग चल दिए मेला देखने... एक किलो मीटर का पैदल सफर तय करके हम लोग पहुंचे मेला देखने। सबसे पहले हमारा सामना केला से हुआ। आगे बढें तो कोका कोला से रंग, पोखरे का पानी और शक्कर......।
फिर गूड की जलेबी और  मिट्टी के खिलौने, गुल्लक..।
बादाम, झाल- मुडी के साथ मेले का रेली-रेला।
हो गया भई मेला.....।

Tuesday, October 16, 2012

समाज सेवा

                                निःशुल्क चिकित्सा शिविर


अदनाना वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान में रविवार, दिनांक- 09.09.2012  को कस्बा स्थित अमर वीर इण्टर कालेज के प्रांगण में निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें नेत्र रोग, हड्डी रोग, स्त्री एवं प्रसूत रोग, जनरल फिजिषियन, दंत एवं मुख रोग तथा बाल रोग के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा लगभग एक हजार मरीजों की जांच कर निःशुल्क दवा वितरित की गयी।
शिविर का उद्घाटन करते हुए सैयदराजा विधायक मनोज कुमार सिंह ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में आज भी बेहतर स्वास्थ सुविधाओं की कमी है, जिस वजह से गरीब, मजदूर व कमजोर तबके के लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सोसाइटी द्वारा निःषुल्क चिकित्सा षिविर का आयोजन कराना सराहनीय पहल है। उन्होने कहा कि दीन-दुखियों की सेवा सबसे पुनीत कार्य है। इससे नवयुवकों को प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होने सोसाइटी द्वारा किए जा रहे विभिन्न मानवतावादी कार्यों की सराहना करते हुए खुद सदैव सहयोग का आष्वासन दिया।
सोसाइटी के प्रबन्धक एम0 अफसर खां सागर ने कहा कि शिविर का प्रमुख मकसद ग्रामीण इलाके के उन गरीब व असहाय लोगों को बेहतर स्वास्थ सुविधायें उपलब्ध कराना है जो इससे वंचित रह जाते हैं। जनसेवा के बल पर समाज में व्याप्त असंतुलन को समाप्त किया जा सकता है। सोसाइटी का प्रयास है कि ग्रामीण समुदाय में शिक्षा, स्वास्थ, वन संरक्षण, महिला कल्याण हेतु जन जागरण अभियान चलाकर लोगों को जगरूक किया जाए।
कार्यक्रम संयोजक डा0 विषाल सिंह ने शिविर में आये लोगों को स्वास्थ सम्बंधित जानकारी प्रदान की व आये हुए लोगों का आभार व्यक्त किया।
शिविर में डा0 रत्ना राय, डा0 धीरेन्द्र सिंह, डा0 अखिलेष सिंह, डा0 षैलेन्द्र सिंह, डा0 कुवंर सतीष, डा0 पंचम, डा0 ज्योति बसु, डा0 प्रमोद, डा0 पवन, डा0 कुमुदरंजन, डा0 विषाल सिंह, डा0 डी0 के0 षुक्ला, एवं डा0 आकाश चन्द पाण्डेय ने मरीजों का इलाज किया।
इस दौरान कालेज के प्राचार्य छेदी सिंह, रविन्द्र सिंह, संतोष सिंह, बृजेश सिंह, शाह आलम खां, गृहषंकर सिंह, इम्तियाज, विवेक यादव, बदरे आलम खां, अंगद यादव, सर्फुद्दीन, इरफान, हामिद, नदीम, सज्जाद, कुर्बान, मुरारी, नन्दू यादव, तबरेज खां साहब सहित सैकडों गणमान्य लोग लोग मौजूद थे।