Tuesday, March 20, 2018

विश्व गौरैया दिवस

घर आंगन की चिड़िया गौरैया की हिफाजत जरूरी
अभी कुछ साल पहले ही अम्मी जब सुबह के वक्त सूप में चावल को पछोरती और बनाती थीं तब छोटी-छोटी चिड़िया झुण्ड में चावल के छोटे टुकड़ों जिसे गांव में खुद्दी के नाम से जाना जाता है उसे खाने के लिए नुमाया हो जाती थीं। फुदक-फुदक कर हल्के कोलाहल के साथ दालान और रोशनदान के साथ पूरे मकान में मानो उनका कब्जा सा हो जाता। वो छोटी चिड़िया थीं गौरैया। जो हमारे और आप के घरों की मेहमान हुआ करती। बच्चों के लिए उड़ने वाली सहेली और घर के लिए मिठास भरी चहक जिसके बरकत से घर-आंगन गुलजार रहता। ऐसा नहीं है कि अब गौरैया नहीं आती मगर उनकी तायदाद दिन ब दिन कम होती जा रही हैं। गौरैया आज संकटग्रस्त पक्षि की श्रेणी में आ गयी है, जो कि पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ होती जा रही है। चन्द साल पहले तक गौरेया के झुंड को आसानी से घरों, गांव, खेत-खलिहान सहित सार्वजनिक स्थलों पर देखे जा सकते थे। लेकिन खुद को परिस्थितियों में ढ़ाल लेने वाली यह चिड़िया अब भारत ही नहीं बल्कि यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफी कम रह गयी है। इटली, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और चेक गणराज्य जैसे मुल्कों में इनकी संख्या जहां तेजी से गिर रही है तो वहीं नीदरलैंड में तो इन्हें ‘दुर्लभ प्रजाति’ के वर्ग में रखा गया है। इनकी संख्या में निरंतर आ रही कमी को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए विश्व गौरैया दिवस पहली बार सन् 2010 में मनाया गया। तब से यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है।
अमूमन हर साल गर्मी की आमद के साथ ही ये नन्ही चिड़ियां अपने लिए घरौंदे बनाना शुरू कर देती हैं। वक्त के साथ विकास के पैमानों में आये बदलाव ने मानव सभ्यता की गोद में पलने वाली इस नन्ही चिड़ियों से इनके आशियाना को छीन लिया है। पहले कच्चे और घास-फूस के मकानों में गौरैया बड़ी आसानी से अपने घोसलें बना लेतीं मगर आधुनिक कांक्रीट के मकानों में इनको घोसलें बनाने की जगह नही मिल पा रही हैं। शहरीकरण ने गावों की दहलीज को अपने गिरफ्त में ले लिया है जिस वजह से दिन ब दिन गांवों की हरियाली और खुली फिजां संकुचित होती जा रही है, यही वजह है कि इनके प्राकृतिक निवास और भोजन के श्रोत भी खत्म होते जा रहे हैं। बाज, चील, कौवे और परभक्षी बिल्लियां आदि भी गौरैया का काफी नुक्सान पहुंचा रहे हैं। बची खुची कसर पंक्षियों के शिकारी पूरा कर दे रहे हैं। कनेर, बबूल, नीबू, चंदन, बांस, मेंहदी, अमरूद के वृक्षों पर ये अपना घोंसला बनाती हैं। छोटे पेड़ व झाड़ियों को काटे जाने से भी इनके प्रजनन पर संकट मण्डराया है। इसके अलावा मोबाइल के टावर भी इनके वजूद को मिटाने में मदद्गार सबित हो रहे हैं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रो मैगनेटिक किरणें गौरैया की प्रजनन क्षमता को कम करती हैं। जिस वजह से दिन ब दिन गौरैया विलुप्त होती जा रही है। इनका कम होना हमारे पर्यावरण के लिए खराब संकेत है। गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नही बल्कि हमारी मानव सभ्यता का एक अंग है और हमारे गाँव व शहरों में स्वस्थ वातावरण की सूचक भी है। गौरैया किसानों के लिए काफी मदद्गार मानी जाती है, ये अपने बच्चों को जो अल्फा एवं कटवर्म खिलाती हैं, वो फसलों को बहुत नुक्सान पहुंचाते हैं।
गौरेया पासेराडेई परिवार की सदस्य हैं। इनकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। ये अधिकतर झुंड में ही रहती हैं तथा भोजन तलाशने के लिए गौरेया का झुंड अधिकतर दो मील की दूरी तय करते हैं। आवश्यकता है कि हम इस नन्ही चिड़िया को घर बनाने के लिए थोड़ी सी जगह दे और इन्हें माकूल सुरक्षा दें तथा यह अपने बच्चों को आसानी से पाल सके इसलिए विषहीन हरियाली उपलब्ध कराने का प्रयास करें। घरों में नेस्ट बाक्स लगायें। गर्मी के दिनों में घरों, आफिस और सर्वाजनिक स्थलों पर बर्तन में पानी व दाना रखने का प्रबंध करें। हमें इन नन्हीं चिड़ियों के लिए वातावरण को इनके अनुकूल बनाने में मदद करनी होगी। ताकि इनकी मासूम चहक हमारे आस पास बरकरार रह सके। आजकल खेतों से लेकर घर के गमलों के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग हो रहा है जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते है और ना ही इस पक्षी को समुचित भोजन मिल पा रहा है। इसलिए गौरैया समेत दुनिया भर के बहुत से पक्षी हमसे रूठ चुके हैं और शायद वो लगभग विलुप्त हो चुके हैं या फिर किसी कोने में अपनी अन्तिम सांसे गिन रहे होंगे। बदलाव की धारा को हम एकाएक नही रोक सकते हैं मगर इस बदलाव की रफ्तार में भी हम उन्हें भी अपने साथ लेकर जरूर चलने की कोशिश कर सकते हैं जो सदियों से हमारे साथ हैं और मानव सभ्यता उनसे फायदा पाती आयी है।
मानव जब भी अपनी राह से भटका है तब प्रकृति ने उसे किसी न किसी रूप में सन्देश देने का काम किया है मगर वह अपनी बेजा ख्वाहिशों की कोलाहल में उसे नजरअंदाज करता आया है। कुदरत के संदेश को नजरअंदाज करने का भयंकर परिणाम भी उसे झेलना पड़ा है। अकाल, भू-स्खलन बेमौसम बारिश, महामारी इसके उदाहरण हैं। संकटग्रस्त गौरैया को बचाना वक्त की पुकार और दरकार है। बच्चों की उड़ने वाली सहेली, घर-आंगन की चहक और फुदक की हिफाजत के लिए हमें गौरैया के संरक्षण की खातिर हर जतन करने की जरूरत है।

Sunday, March 18, 2018

आज के दिन

स्वागत करिये भारतीय नव वर्ष का


इंसान की जिन्दगी में आने वाला हर नया साल उसके लिए बहुत ही कीमती होता है। बीतते वक्त के साथ बदलता कैलेण्डर हमारे लिए महज तारीख का बदलन नहीं है बल्कि हमारे भूत और भविष्य की दिशा निर्धारण का पैमाना होता है। साल की शुरूवात इंसान की जिन्दगी में उमंग और उल्लास के साथ खुशी लेकर आनी चाहिए न कि हाडकपाती ठण्ड! हम भारतवासी ईसवी सन् के प्रथम दिन यानि एक जनवरी को नये वर्ष के रूप में बड़े धूम-धाम से मनाते हैं। जिसका न तो कोई खगोलीय प्रतिष्ठा है, न प्राकृतिक अवस्था और न ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमी। जनवरी के सर्द मौसम में हाड कपाती ठंड व रक्त संचार जमा कर मनुष्य की गतिशीलता को रोक देता है। पेड़ पौधों का विकास रूक जाता है तथा उनके पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस मौसम में सूरज का प्रकाश भी मध्म पड़ने लगता है। कोहरे के धुंध में सब कुछ धुंधला सा दिखता है। जल के श्रोत बर्फ का चादर ओढ़ लेते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने इसी सब को देखकर नवम्बर 1952 में परमाणु वैज्ञानिक मेघनाथ साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति का गठन किया था। इस समिति में एस. सी. बनर्जी, गोरख प्रसाद, वकील के एल दफतरी, पत्रकार जे. एस. करंडिकर व गणितज्ञय आर. वी. वैद्य थें। समिति ने सन् 1955 में सर्व सम्मती से विक्रमी संवत पंचांग को स्वीकार करने की सिफारिश की। मगर पंडित नेहरू ने ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही सरकारी कामकाज के लिए उयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को ग्रेगेरियन कैलेंडर को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार किया। 
भारतीय नव वर्ष मनाने के लिए सबसे उपयुक्त विक्रम संवती का प्रथम दिन है क्योंकि प्रकृति इस समय शीतलता एवं ग्रीष्म की आतपता का मध्य बिन्दु होता है। जलवायु समशीतोष्ण रहती है। बसंत के आगमन के साथ ही पतझड़ की कटु स्मृति को भुलाकर नूतन किसलय एवं पुष्पों के युक्त पादप वृन्द इस समय प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार करते दिखते हैं। पशु-पक्षि, कीट-पतंग, स्थावर-जंगम सभी प्राणी नई आशा के साथ उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त दिखाई पड़ते हैं। चारों तरफ सब कुछ नया-नया दिखयी पड़ता है। मनुष्य की प्रवृत्ती उस आनन्द के साथ जुड़ी हुई है जो बारिश की प्रथम फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागत में पक्षी के प्रथम गान या फिर नवजात शिशु का संसार में प्रथम आगमन के किलकारी से होता है। 
ऐसा माना जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की याद में इसी दिन राज्य स्थापित कर विक्रमी संवत की शुरूवात की। मर्यादा पुरूषोततम राम के जन्मदिन रामनवमी से नौ दिन पहले मनने वाले उत्सव भक्ति व शक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र का प्रथम दिन तथा लंका विजयोपरान्त आयोध्या लौटे राम का राज्याभिषेक इसी दिन किया गया। यही नहीं शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हुणों को परास्त कर दक्षिण भारत में राज्य स्थापित करने हेतु इसी दिन का चुनाव किया। उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, आन्ध्र प्रदेश में उगादी, महाराष्ट में गुड़ी पड़वा, सिंधु प्रांत में चेती चांद के रूप में नव वर्ष बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इसी दिन को दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना। भारतीय परम्परा व शास्त्र के अनुसार विक्रम संवत का पहला दिन ही भारतीय नव वर्ष के रूप में मनाया जाना उचित व प्रसंगिक है। आइये दिल खोलकर विजय मिश्र बुद्धिहीन की काव्य रचना के साथ भारतीय नव वर्ष का स्वागत करें...
  
  स्वागत तेरा नव विहान
  खेले होठों पर हंसी कली 
  है विहंस रहा सारा वितान
  स्वागत तेरा नव विहान।

 पत्ते पत्ते खुशी मनाए    
 मंद पवन है अंग लगाए
 पलक पाँवड़े बिछा सभी
 हैं विहंग कर रहे मधुर गान
 स्वागत तेरा है नव विहान। 
 email- mafsarpathan@gmail.com

Friday, March 16, 2018

व्यंग्य

दल बदलन के कारने नेता धरा शरीर

एम. अफसर खान सागर

सियासत क्या बला है और इसके दाव पेंच क्या हैं इसका सतही इल्म न मुझे आज तक हुआ और न मैने कभी जानने की कोशिश की। अगर यूं समझें कि सियासी के हल्के में फिसड्डी हूं तो गलत न होगा। मगर सियासत ऐसी बला है कि आप इससे लाख पीछा छुड़ाएं मगर छूटने वाला नहीं है। देश व प्रदेश की बात तो दूर आजकल गली-मुहल्ले में नेताओं की लाइन लगी है। नेता ऐसे कि आज फलां की जिंदाबाद तो तो कल फलां की। या यूं कह लें कि सुबह और शाम में सियासी दल और झण्डा बदलने में माहिर हैं। इनकी महारत ऐसा कि गिरगिट भी मात खा जावे। इनके कारनामों की देन है कि आज हिन्दुस्तानी सियासत का पूरा हुलिया ही बदल गया है। गुजरे जमाने के नेता अगर ये सब देख लें तो अपना माथा ही ठोक लें। राजनीति बदली और बदलने की राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ। दल बदले और दल बदलुओं का चरित्र भी बदल गया।

ठीक इसी फारमेट के एक नेता मुंशी दरबारी लाल मेरे पड़ोस में रहते हैं। अखबारी आदमी हूं सो हर रोज उनसे सामना होना लाजमी है। सुबह किसी दल का प्रेस नोट लेकर आते हैं तो शाम होते दूसरे दल का। बेचारे झण्डा और टोपी बदलते-बदलते इतने बदल गयें कि लोग उन्हे न तो किसी दल और न ही पैदल मानते हैं मगर अपने इस चरित्र पर काफी गौरवान्वित महसूस करते हैं। एक शाम मुंशी दरबारी लाल प्रेस नोट लेकर आयें और कहने लगें, भाई साहब! राजनीति का जो हालिया दौर चल रहा है उसमें मुझ जैसों के लिए बहुत संभावनायें दिखती हैं। दौर ऐसा कि कुछ कहा नहीं जा सकता कौन किस दल में है, रहेगा या जाएगा। ठीक आपके मीडिया जगत की तरह। आज हैं प्रधान सम्पादक तो कल मामूली पत्रकार या पैरोकार। दल तो ऐसे बदला जा रहा है जैसे लोग कपड़े बदलते हैं। मैं तो दलबदलुओं का काफी सम्मान करता हूं। सलाम करता हूं उनके मौकापरस्ती को। शीश नवाता हूं उनके तोल-मोल या खरीद-व-फरोख्त के आगे। आस्था रखता हूं उनके दलबदलू चरित्र में। ये भी क्या कि एक दल के दलदल में दल का दोहा जपते-जपते स्वर्ग सीधार जाए, न पद न प्रतिष्ठा और न लाल-पीली बत्ती की आस। सिर्फ दल की मर्यादा का ख्याल रखो, आला कमान और हाई कमान के आदेशों और आज्ञा का पालन करो। सिद्धानतों की पोटली ढ़ोते-ढ़ोते उम्र के साथ नेतागीरी ही एक्सपायर हो जाये। ऐसी बेवकूफी भरा काम तो सिर्फ और सिर्फ गधा ही कर सका है न कि नेता।

आजकल राजनीति तो मौकापरस्ती का दूसरा नाम है। खुद के लाभ की खातिर वसूलों-सिद्धांतों से समझौता कर लेने में ही भलाई है, कहावत है जैसा देश वैसा भेष। देखिए ना कल्याण सिंह जी को खालिस राम भक्त थें पहले भी आज भी हैं। क्या हुआ जो बीच में समाजवाद का टेस्ट ले लिया। लाल व केसरिया टोपी में अन्तर ही क्या है? मैं तो छोटे चैधरी से काफी हद तक सहमत हूं, एन.डी.ए. और यू.पी.ए. में फर्क क्या? सिर्फ मंत्रीपद से सरोकार। नरेश अग्रवाल जी का चरित्र तो इस मामले में एकदम दुरूस्त है हाथी व साइकिल के बीच हमेशा गैप बना के चलते हैं। सरकार बदले ही सवारी बल लेते हैं। केसरिया फिजा में लाल व नीला रंग के धुंधला पड़ने की वजह से अग्रवाल  जी तो चल दिये कमल खिलाने। बात दीगर है कि सिर मुड़ाते ओले पड़े! भई! हम किसी के साथ आखिर रहें क्यों? जब हमारे लोगों को लाभ व सम्मान ही न मिल पावे। दलबदलुओं का अपना कुछ वसूल भी होता है जिसपर वे पूरी तरह अमल करते हैं। परिवर्तन प्रकृति का शाष्वत नियम है मगर उसके अपने तरीके होते हैं। दल बदलने के बाद नेता शाम की शुरमई रोशनी के साथ किसी दूसरे दल के सिद्धांतों के तालाब में कूद कर फ्रेश हो जाता है। जहां  पुरान पार्टी के सिद्धांतों के मैल को नई पार्टी के वसूलों के क्लीनिंग सोप से रगड़-रगड़ के धो डालता है। गाडी से पुराने दल के झण्डे को उतार कर नये दल के झण्डे से चमका देता है। इतना ही नहीं नये दल के दफ्तर में उसके आमद का तमाशा होता है और उसके चरित्र के कसीदे पढ़े जाते हैं। मोटी माला पहनाकर नये अवतार में पेष किया जाता है। वह भी पर्टी के सिद्धांतों के लिए जीने-मरने की कसमें खाता है। ...फिर क्या दल में पद के ताज से उसका मसतक उंचा किया जाता है, इस दौरान उसको काफी मान व सम्मान का बोध कराया जाता है। ऐसे में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं से उसको फजीलत खुद-ब-खुद हासिल हो जाती है। अगर दल सत्ता में आ जावे तो सिंहासन भी मिलना वजिब है। आप ही सोचिए जब दल बदलने पर इतना ईनाम व एकराम मिले तो नेता क्यों न दलबदलू होवे।

दलबदलूओ से आधुनिक राजनीति को आक्सीजन मिल रहा है। अगर ये खत्म हो गये तो कितनों के राजनीति संकट आ जायेगा। इनके ना रहने से छोटे सियासी दलों के साथ बड़े दलों को भी सरकार बनाने में दिक्कत व मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। बेहद पवित्र व मुफीद है दलबदलू चरित्र। मैं तो साफ कहता हूं जनबा! दल बदलन के कारने नेता धरा शरीर।

email- mafsarpathan@gmail.com

Wednesday, October 18, 2017

कहानी

आवारा

शाम के आठ बज रहे थे, मोबाइल ने घन-घनाना शुरू किया तो रीमा ने करवट बदल कर देखा कि फिर वही नम्बर। पहले तो उसने काल रिसीव नहीं करना चाहा मगर रिंग पर रिंग बजा जा रहा था तो उसने अचानक काल रिसीव कर कहा ‘तुमसा आवारा लड़का मैंने अपने जीवन में नहीं सोचा था’ और काल डिसकनेक्ट हो गया। इतना सुनना था कि फोन करने वाला सन रह गया, मानो उसे सांप ने डस लिया हो। पिछले चार साल के सम्बन्ध में उसने रिंग तो कितनी बार किया होगा मगर शुरूवाती जाड़े की वह शाम उसके लिए तपती गर्मी के झोंकों से कम न था।
उस शाम चार साल पहले तक समीर की जिन्दगी विरान सहरा में उड़ते रेत की मानिंद भटक रही थी। कब शाम और कब सुबह होती उसको इसका इल्म न रहता। जिन्दगी की रंगीनियों और प्यार की बारीकीयों के बारे में उसनें कभी सोचा भी होगा, ऐसा उसे नहीं लगता। बस एक लिखने का धुन सवार रहता उस पर और वह उस धुन में अक्सर बुझा रहता। वक्त की रेत पर जिन्दगी धीरे-धीरे कट रही थी। तभी एक दिन समीर के खास दोस्त की मोबाइल का रिंग बजा। रिसीव करने पर आवाज आयी, हैलो..... आप कौन, चूंकि नम्बर अंजान था सो उसने काल करने वाले से यह सवाल पूछा। उत्तर था, आप से ही बात करनी थी। इतना सुनना था कि दोस्त ने जवाब दिया कि मैं अंजान लोगों से बात नहीं करता और फोन काट दिया।
रात बीती सुबह हुआ फिर आयी वो शाम जिसने समीर की जिन्दगी में ऐसा भूचाल पैदा किया कि वह उसे याद कर आज भी यादों की सफर पर चला जाता है। शाम के सात बज रहे थे, बाजार से होता हुआ समीर घर की जानिब मुखातिब हुआ ही होगा कि उसके मोबाइल पर डाइवर्ट काल आया। हैलो... हैलो, काफी नाजुक व मखमली आवाज। आप कौन, ऐसा आवाज कि जिसे सुन कर कोई भी नाम बताने से गुरेज न करे। सो समीर ने जवाब दिया.... समीर कहते हैं लोग। इतना सुनना था कि काल डिसकनेक्ट हो गया। उस मखमली आवाज ने समीर को पूरी रात बेचैन रखा। रात भर वह सोचता रहा, कौन... कहाँ से.... क्यों ? फिर दूसरे दिन उसी नम्बर से काल आया। आप कौन, समीर ने बस यही पूछा था उससे। जवाब भी उसने समीर की अन्दाज में ही दिया, रीमा कहते हैं लोग और फिर फोन कट गया। फिर जो सिलसिला चालू हुआ वो दरिया की रवानी की तरह बहता रहा। बीच-बीच में मौजों ने जरूर कभी-कभार हिचकोले लिये होंगे मगर रवानी में कमी न आयी। रोज शाम के वक्त समीर के मोबाइल पर उसी नम्बर से काल और मिसकाल आता रहा। फिर शुरू हुआ बातों का ऐसा दौर जिसने दोनों को एक अन्जान रिश्ते में कैद कर दिया। बातों ही बातों में चार साल का तवील सफर कैसे बीत गया, इसका तनिक भी एहसास नहीं हुआ।
बातों का सिलसिला बढ़ता गया, दिलों की दूरियाँ नजदीकियों में तब्दील होती गयीं। बरबस चीजों से लगाव बढ़ता गया। रंग, खुशबू और प्रकृति में मन रमता गया। अन्ततः दोनों दिल शायद प्यार रूपी सागर में गोते खाने लगे। बस एक यही वजह था कि दोनों प्यार को जिन्दगी और जिन्दगी को प्यार समझ बैठे। दोनों का एक-दूसरे पर अधिकार बढ़ता गया। एक-दूसरे की पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखना अब दोनों का आपसी मसला बन गया। समीर को काला रंग पसन्द नहीं था सो रीमा ने काली चीजों से दूरी बना लिया। यहाँ तक की काला कपड़ा पहनना छोड़ दिया। रिश्तों की डोर इतना मजबूत होता गया कि समीर की हर पसन्द रीमा की पसन्द और रीमा की हर पसन्द समीर की पसन्द बना। वक्त धीरे-धीरे गुजरा जा रहा था। बातों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इसी बीच रीमा को परीक्षा देने शहर जाना पड़ा। शहर में रीमा नई थी, न वहाँ कोई सहेली, न ही कोई आत्मीय सम्बन्ध। पिंजरे में कैद बुल-बुल की माफिक रीमा तड़प उठी। हफ्तों समीर से बातें न हो पायी, बेचैनी बढ़ता गया। फिर तरकीब निकला, रीमा ने पड़ोस की आंटी की लड़की से दोस्ती कर ली और उसीके सहारे बातो का दौर पुनः चल पड़ा। वक्त, बेवक्त बातें होती मगर सुकून था कि सम्पर्क तो कायम है। पूरे छः माह तक रीमा ने कैद की जिन्दगी गुजारी। फिर आजादी मिली परीक्षा खत्म कर गाँव वापसी हुई। 
समय तो नियत गति से बहता चला जा रहा था, उस पर किसका बस है। जिन्दगी में पड़ाव तो कई आये मगर दोनों ने रूकना गवारा नहीं किया। एक दिन भी अगर बातें न होती तो बेचैनी इस कदर बढ़ जाती मानों सांप ने डस लिया हो या बिच्छू ने डंक मार दिया हो। समीर के खास दोस्त को दोनों की नजदीकीयों से चिढ़ होने लगा। उनकी बातें करना मानो इसके कलेजे पर सांप लोटने जैसा हो। एक दिन समीर के उसी खास दोस्त ने कहा कि समीर सुना है रीमा की एक सहेली काफी सुन्दर है, यार मेरी उससे  बात करा दो। चूंकि समीर का वह खास दोस्त रीमा से चिढ़ रखता था और उसने उसे कितनी बार गालियां भी दे चुका था सो रीमा तैयार नहीं हुई। समीर ने भी कहा कि तुम्हारा व्यवहार खराब हो चुका है इसलिए उससे तुम्हारी कभी बात नहीं हो सकती। समीर की ये बातें उसको तीर की तरह चुभीं। उसने समीर से कहा कि मैं तुम्हे और रीमा को इतना बदनाम कर दूंगा कि तुम लोग मुह दिखाने के काबिल नहीं रहोगे। फिर उसने इंतकाम लेने की ठानी। दोनों के बीच तल्खि़यां बढ़ती गयीं। समीर के दो और करीबी दोस्त थें, जिनसे वह अपने जीवन की हर पोशीदा राजों को बताया करता था। जिन्हे समीर ने समाज की गुमनामी से उजाले में लाने का सफल प्रयास किया तथा उन्हे वह अपने उस खास दोस्त से परिचय भी करवाया था। मगर वही दोस्त समीर के खिलाफ हो गयें। इंतकाम की आग दिन-ब-दिन तेज लपटों के साथ रिश्तों की डोर को जलाती चली गयी। दोस्त दुश्मनी पर आमादा हो गये। जो कभी एक-दूसरे से मिले बिना नहीं रहते आज ऐसी बेरूखी पर उतारू थे कि अगर सामना भी हो जाता तो मुंह फेर लेते। कहते हैं कि जर, जोरू और जमीन हर जंग की बुनियाद रही है। शायद इसी में से किसी एक वजह ने आपसी मन-मुटाव पैदा किया। समीर एकदम अलग-थलग पड़ गया और उसकी पूरी मित्र मंडली उसका दुश्मन बने बैठा था। शाजिसों का दौर चला। झूठी गाहियां, ऐसी कि जिसे सुनकर मानवता भी शर्मसार हो जाये। रीमा व समीर के रिश्ते को कलंति करने का हर षड्यंत्र रचा जाने लगा। 
और फिर आयी दीपावली की प्रकाशमान रात, जिसमें पूरा देश जगमगा रहा था। चारों तरफ दीप जलें, खुशियों का ऐसा कारवां जिसमें हर कोई सराबोर था। मगर उस रात दीप की जगह रीमा का दिल जल रहा था। रीमा के अरमान जल रहें थे। यहां तक की रीमा खुद धधक उठी थी। चूंकि रीमा के चाचा की लड़का की शादी समीर के खास दोस्त के भाई से हुई थी, जिससे समीर का जंग था। समीर ये कभी न सोचा था कि रिश्ते कभी इतने पतीत हो जायेंगे कि समाज के मर्यादाओं को भी लांघ जायेंगे। समीर के उसी खास दोस्त ने रीमा को बदनाम करने की एक सुनियोजित शाजिस रची जिसमें पूरा मित्र मंडली सरीक हुआ। जो दोस्त कभी समीर के अजीज थे आज रकीब बन बैठे थे। रीमा के दिल में ऐसी नफरत भरने की शाजिस हुई कि वह समीर से नफरत करने लगे। एक दिन वही खास दोस्त रीमा को उसकी सहेली समझकर समीर के खिलाफ भड़काने का असफल कोशिश कर चुका था फिर भी रीमा नहीं हिली। सो उसने रीमा की बहन को रीमा के खिलाफ इतना भड़काया कि वह आग बबूली हो गयी। आग में घी डालने का काम समीर के वही अजीज कर रहे थे जो आत रकीब बन बैठे थे। उन्होने रीमा की बहन से झूठी गवाही दी कि रीमा तो समीर के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिरती है। होटलें अटेंड करती है, शापिंग करती है समीर के साथ। बहुत कुछ ऐसा जो सामाजिक रिष्तों को तार-तार करती हो वही बातें रीमा के बहन को बताई गयी। जबकि रीमा व समीर की मुलाकात शायद ख्वाबों में भी नहीं हुई होगी। ऐसी गवाही जिसे सुन कर एकबार जानकारों की भी आँखें धोखा खा जाये। क्योंकि जब अजीज रकीब बनता है तो उसकी बातों में सौ फीसदी सच्चाई झलकता है। इसलिए रीमा की बहन को भी उनकी झूठी बातों पर एतबार हो गया। फिर क्या था उस दीपावली की रात में रीमा को जलाना उसकी बहन के लिए आसान हो गया। गुस्से से लबरेज उसने रीमा से कहा कि तुम ऐसा निकलोगी, यकीन न था। तमाम ऐसे निराधार आरोप रीमा के उपर मढ़े गये जिसको सुन कर रीमा के होश फाख़्ता हो गये। जब रीमा की रूसवायी की खबर समीर के रकीब दोस्तों के पास गयी तो उनके खुशी के ठिकाने नहीं रहे। पार्टियों का दौर चला। मगर उन्हे ये मालूम नहीं था कि झूठ के पैर नहीं होते।
शाम का वक्त था, समीर दीपावली की रोशनी व खुशियों में शराबोर था और वी रीमा को भी उसी रोशनी में नहलाना चाहता था मगर दीपावली की वह शाम रीमा के लिए अमावस से कम न थी। समीर बार-बार रीमा को रिंग किये जा रहा था और हर बार काल डिसकनेक्ट हो जाता। फिर रीमा ने काल रिसीव कर जो शब्द कहे उसे सुनकर समीर के होश व हवास जाते रहे। समीर के दोस्तों की चाल कामयाब हो चुकी थी। रीमा भी समीर से काफी दूर निराशा के गहरे खन्दक में जा धसी थी। बहुत आजीजी के बाद रीमा ने बात करना कुबूल किया। समीर से जब उससे सच्चाई और शाजिस की हकीकत बयान किया तो वह तड़प उठी। अब उसे अपने बेगाने व समीर अपना लगने लगा। रीमा के लिए रिश्तों के मायने बदल चुके थे। रीमा ने समीर से एक बात कही कि तुमने मेरे विश्वास का गला घोटा है, अपने व्यक्तिग जीवन के राजों को दोस्तों में बांट कर खुद को तमाशा बनाया। तुम्हारे दोस्त इतनी घटिया सोच रखते हैं, मैने कभी ऐसा सोचा नहीं था। तुमसे कोई शिकायत नहीं है मगर हाँ, तुम आवारा हो और रीमा की आँखें छलक उठीं।

Friday, October 6, 2017

सोशल मीडिया में बदजुबान होती अभिव्यक्ति की आजादी

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प सरीखे सोशल साइट्स ने वैश्विक स्तर पर लोगों को करीब आने का मौका दिया है तथा एक-दूसरे के विचारों और संस्कृति से परिचित भी कराया है। संचार का सदव्यवहार संवाद और संस्कृतियों के प्रसार का हमेशा से आधार रहा है। जिस तरह से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लोगों के विचारों में खुलापन आ गया है। सोशल मीडिया ने पूरे विश्व में लोगों को आन्दोलित सा कर दिया है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मुद्दे सोशल मीडिया पर अक्सर बहस के विषय बनते रहते हैं। राजनेता, खिलाड़ी, सिनेजगत के कलाकार सहित युवा वर्ग में सोशल मीडिया के प्रति काफी रूझान है। हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का यह बेहतर मंच साबित हुआ है मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका बेजां इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इस वैचारिक अतिक्रमण ने अभिव्यक्ति की आजादी को कुछ हद तक बदजुबान बना दिया है।
सोशल मीडिया का उपयोग संवाद के माध्यम के रूप में किया जा रहा था तो कुछ हद तक ठीक था मगर राजनीति के अखाड़ा में तब्दील होने के बाद यह आरोप-आपेक्ष का माध्यम तो बना ही इसके जरिए राजनीतिक दलों के समर्थक गाली-गलौज भी करते आसानी से नजर आ सकते हैं। गुजरात में पटेल आन्दोलन और नोएडा के दादरी की घटना सहित विभिन्न संजीदा घटनाओं के बाद तनाव के लिए सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा किया जाना लाजमी है। यह सवाल सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि उसके इस्तेमाल करने वालों पर है। हाल के दिनों सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर धर्म विशेष, पार्टी विशेष और व्यक्ति विशेष के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और कमेंट ने इस बड़े माध्यम को आचरण विहीन जुबानी जंग का मैदान सरीखा बना दिया है। देश के बड़े सियासी नेताओं को सहित हर मुद्दों पर बेहूदा पोस्ट कर के उसका मखौल उड़ाना निंदनीय है। असहमती का अधिकार लोकतंत्र में सभी को है मगर संवैधानिक दायरे में रह कर। हमें किस मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए इसका ख्याल रखना बेहद जरूरी है। इसके इस्तेमाल करते समय सभी को काफी जागरूक और संवेदनशील रहने की जरूरत है। आज कल सोशल मीडिया पर राजनेताओं का मखौल उड़ाना आम बात बन गया है। इसके लिए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता समेत समर्थक और विरोधी जिम्मेदार हैं। सियायी दल के नुमाइन्दों सतिह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व मंत्रियों के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर आसानी से देखने को मिल जाती हैं, जो कि हमारे अभिव्यक्ति के आजादी का बेजां इस्तेमाल के सिवा कुछ नहीं। इस चलन से सभी को बचने की जरूरत है। असहमती की दशा में हमें सहनशील हो कर अपने विचार रखने की जरूरत है। विरोध और समर्थन का तरीका सभ्य होना चाहिए।
धार्मिक विषयों पर कुछ लिखने या अपनी राय रखते समय यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारे पोस्ट से समाज का कोई तबका आहत न हो। धर्म आचरण का विषय है समाज का हर व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है कि वह खुद के धर्म का सम्मान जरूर करे मगर दूसरे धर्म के खिलाफ गलत टिप्पणी ना करे। ऐसी दशा में विरोधाभास कम देखने को मिलेगी। हमें यह सोचना होगा कि सोशल मीडिया एक बन्द खिड़की नहीं है वरन खुला आसमान सरीखा है। हमारी बात चन्द लोगों तक जरूर पहुंचती है मगर उसका दायरा नदी के उस बहाव की तरह है जिसे चाह कर नहीं रोका जा सकता। ऐसी दशा में कभी-कभी कुछ गलत और समाज के किसी खास तबके को आहत करने वाले पोस्ट वायरल हो जाते हैं, जो दो समुदायों, दो समाजों के बीच नफरत फैलाने के लिए काफी होते हैं। ऐसे पोस्टों पर शाब्दिक हिंसा जोरों से होने लगती है। जो कि बहुत ही खतरनाक दौर तक पहुंच जाती है।
सोशल मीडिया ने सूचना और संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दिया है। इस माध्यम ने न केवल लोगों को एक-दूसरे को जोड़ने का काम किया है बल्कि स्वतंत्र प्रतिक्रिया देने का सशक्त प्लेटफार्म मुहैया कराया है। हमें अपनी बातों को समाज के बीच बिना सेंसर के रखने का जरिया है सोशल मीडिया, इसका यह मतलब कत्तई नहीं की हम कुछ भी लिख और बोल दें। संवाद के इस सशक्त माध्यम के जरिये हमें शाब्दिक हिंसा फैलाने से बचने की सख्त जरूरत तो है ही साथ दूसरों की मर्यादा और निजता का भी ध्यान रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी के खिलाफ आरोप-आक्षेप लगा कर हम इस बड़े माध्यम का अपमान न कर खुद के संस्कारों को प्रदर्शित करते हैं। इस माध्यम का उपयोग करते समय हमें यह सोचने की जरूरत है कि अपनी सभ्यता और मर्यादा का ध्यान रख कर समाजहित की बातों और बेहतर सूचनाओं को फैलाएं। राष्ट्रीय एकता और विकास के मुद्दों पर सार्थक बहस से इस माध्यम का बेहतर सदुपयोग किया जा सकता है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर युवा वर्ग की संख्या ज्यादा है, ऐसे में युवाओं को चाहिए कि आतंकवाद और कट्टरता के खिलाफ व्यापक बहस कर लोगों जाकरूक करने का प्रयास करें। समाज में सद्भाव और समरस्ता को बढ़ावा देने के लिए भी इसका बेहतरीन इस्तेमाल किया जा सकता है। सोशल मीडिया को गाली-गलौज और आरोप-आक्षेप का माध्यम बनाने वालों को सोचने की जरूर है कि डिजिटल इण्डिया मुहीम को स्वच्छ भारत अभियान के तहत लाकर इस बड़े माध्यम का सार्थक इस्तेमाल किया जा सके और समाज को बेहतर संदेश दिया जाये।

Saturday, March 12, 2016

आखिर क्यों पैदा होने से पहले दफ्न हो रही हैं बच्चियां ?

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुल्क में सख्त कानून होने के बावजूद मासूम बच्चियों को पैदा होने से पहले ही दफ्न करने के मामले बदस्तूर जारी हैं। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान भी चल रहे हैं मगर उनका व्यापक असर आना बाकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कन्या भ्रूण हत्या को मुल्क की मानसिक बीमारी तक बता दिया फिर भी लोग नहीं चेत रहे। धर्म चाहे कोई हो स्त्री को मां, बहन और बीबी का दर्जा हासिल है बावजूद इसके सामाजिक रूढि़वादीता ने हमें न जाने कितना गिरा दिया है। भारतीय संस्कृति में स्त्रीयों की पूजा की जाती है फिर भी पुत्र प्राप्ति की चाह में आज भी कई कन्याएं जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दी जा रही हैं। बालिकाओं पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ सरकारी तंत्र के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को इसके लिए आगे आना होगा। महिला सशक्तिकरण का परचम बुलन्द करने से पहले बालिकाओं को बचाने की जरूरत है, क्योंकि जब बालिकाओं ही वजूद खतरे में रहेगा तो ऐसी दशा में महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। महिलाओं पर होने वाले अपराधों की पहली शुरुआत कन्या भ्रूण हत्या से होती है। चिंताजनक और विचारणीय तथ्य है कि हमारे मुल्क के संवृद्ध राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ती गैरकानूनी, अमानवीय और घृणित है। इसके खिलाफ समाज को पुरजोर आवाज बुलन्द करना होगा। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या-भ्रूण हत्या की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। अगर आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो सन् 1981 में 0.6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में यह आंकड़ा 1000-927 हो गया। सन् 2016-17 तक इसे इसे बढ़ा कर 950 करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। एक आंकड़ा के मुताबिक हमारे देश में प्रतिवर्ष करीब 40 लाख महिलाएं गर्भपात करवाती हैं। हालांकि कन्या भ्रूण हत्या के लिए गर्भपात तो प्रमुख वजह है ही इसके अलावा कन्या मृत्यु दर का अधिक होना भी प्रमुख वजह है। जिससे साफ जाहिर होता है कि बच्चों की अपेक्षा बच्चियों की देख-भाल ठीक तरीके से नही होने से कन्या मृत्यु दर ज्यादा है।
कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए मुल्क में कानून की कमी नहीं है। इसको रोकने के लिए कई कानून व एक्ट बने हैं। सन् 1995 में बने “जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम, 1995 (प्री नेटन डायग्नोस्टिक एक्ट, 1995)” के मुताबिक बच्चे के जन्म से पूर्व उसके लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 के अन्र्तगत गर्भाधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले ‘कन्या भ्रूण हत्या’ के लिए लिंग परीक्षण करने को कानूनी जुर्म ठहराया गया है। इसके साथ ही गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1971 के अनुसार केवल विशेष परिस्थितियों में ही गर्भवती स्त्री अपना गर्भपात करवा सकती है। जब गर्भ की वजह से महिला की जान को खतरा हो या महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को खतरा हो या गर्भ बलात्कार के कारण ठहरा हो या बच्चा गंभीर रूप से विकलांग या अपाहिज पैदा हो सकता हो। आईपीसी में भी इस सम्बंध मंे प्रावधान मौजूद हैं। आईपीसी की धारा 313 में स्त्री की सहमति के बिना गर्भपात करवाने वाले को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इन सबके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या के मामले दिन-ब-दिन बढ़े ही जा रहे हैं। पुत्र रत्न की प्राप्ति के नशे में चूर पिता और कन्या भ्रुण हत्या के लिए तैयार महिलाएं भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कानून कमजोर नहीं है और सजा का प्रावधान भी पर्यपात है। मगर डाक्टरों की एक जमात जो लालच में सोनोग्राफी के जरिए लिंग निर्धारण करके जन्म से पहले ही कन्याओं के कत्ल में बढ़ी भूमिका अदा कर रही है। हालांकि इसके लिए सख्त कानून हैं फिर भी कहीं न कहीं कानून के अनुपालन एवं सम्बन्धित व्यक्तियों में इच्छा शक्ति की कमी की वजह से ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही हो पाने में बाधा उत्पन्न होती जतर आ रही है।
कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने वाले कारणों पर चर्चा किए बिना इसके निदान पर पहुंचना बेमानी होगा। सभ्य और शिक्षित समाज में दहेज लोभी भेडि़ये कन्या भ्रूण हत्या को फैलाने में काफी हद तक मददगार साबित हुए हैं। सुरसा की तरह मुहं बाये महंगाई और गरीबी में  इंसान का अपने परिवार का पेट पालना मुश्किल साबित हो रहा है एसे में उसे दहेज की चिंता ने कन्याओं से मोहभंग कर रखा है। इस भेद-भाव के पीछे सांस्कृतिक मान्यताओं एवं सामाजिक नियमों की भूमिका से इंकार नही किया जा सकता है। पिता के बाद पुत्र पर ही वंश आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होती है, माता-पिता को मुखाग्नि देने की परम्परा आदि। कन्या भ्रूण हत्या में पिता और परिवार की भागीदारी से ज्यादा चिंता का विषय है इसमें मां की सहमति। एक मां जो खुद स्त्री होती है, वह कैसे अपने ही अस्तितव को नष्ट कर सकती है और यह भी तब जब वह जानती हो कि वह बच्ची भी उसी का अंश है। कभी-कभी औरत ही औरत के ऊपर होने वाले अत्याचार की धुरि बनती है, इस कथन को ऐसे परिदृश्य में गलत नहीं साबित किया जा सकता है। स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचार की खबरें सदैव ही सुर्खियां में रहती हैं, मगर जितनी स्त्रियाँ बलात्कार, दहेज और दूसरी मानसिक व शारीरिक अत्याचारों से सताई जाती हैं, उनसे कई सौ गुना ज्यादा तो जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं। आज जरूरत है कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सामाजिक जागरूकता पैदाकर लोगों को लकड़ा और लड़की में पनपे फर्क को दूर करने की। इस बात को समझाने की सख्त आवश्यकता है कि लड़कीयां किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं। राजनीति, व्यवसाय, नौकरी, शिक्षा, खेल, सिनेमा, कला सहित दूसरे क्षेत्रों में ये किसी से कम नहीं हैं। आज महिलायें उन सभी उपब्धियों को पाने में सक्षम हैं जो पुरूष हासिल कर सकते हैं। प्रतिभा देवी पाटिल, सोनिया गांधी, जयललिता, आनन्दी बेन, मायावती, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, मैरीकाम, इन्दिरा नूई, चन्दा कोचर, सुनीता विलियम्स सहित अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। इन महिलाओं ने समाज को दिशा देने का काम किया है। ये चन्द उदाहरण हैं जो लड़की और लड़का के फर्क को मिटाती है। अगर हम समाज की छोटी ईकाइ परिवार से ही बच्चियों और महिलाओं को बराबरी का हक दे ंतो ये लड़कों और पुरूष से कहीं कम साबित नहीं होंगी। रूढि़वादी मानसिकता से उपर उठकर हमें बच्चा और बच्ची के फर्क को मिटाना होगा। ये समझना होगा कि 21वीं सदी में हम किस दिशा में जा रहे हैं? हां, धर्म और समाज की मान्यताओं को सुरक्षित रखते हुए इन्हे जीने की पूरी आजादी देनी होगी। अगर बच्चियों का वजूद यूं ही मिटता रहा तो हम बेहतर बीबी, बहन और मां कहां से लाएंगे? कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सबसे पहले महिलाओं को आवाज बुलन्द करना होगा। इसके साथ समाज के नजरिए में व्यापक बदलाव लाने की जरूरत है वर्ना ऐसे ही पैदा होने से पहले बच्चियां दफ्न होती रहेंगी।
प्रकाशित- सम्पादकी हिन्दी दैनिक, खबर विजन, वाराणसी
दिनांक- 17 जनवरी 2016

Sunday, May 12, 2013

आखिर क्यों?






उजालों ने उसी को निशाना बनाया है
तारीकीयों ने जिसे हरदम सताया है

वक़्त के औराक़ दिन--दिन मैले होते जा रहे हैं
हिन्द की बेटियों को दरिन्दों ने निशाना बनाया है

चलती बस में आबरू लूटी गई तो क्या हुआ
घर की दहलीज पर भी उन्हे तड़पाया गया है

मां, बहन, बीबी सबको प्यारी है
फिर भी बेटियों को कोख में मारा गया है

घर की जीनत उन्ही से है, ऐसा लोग कहते हैं
फिर जाने क्यों उन्ही पे सितम ढ़ाया गया है

मां के क़दमों में जब जन्नत की बशारत हैसागर
अखिर क्यों हर दौर में औरतों को ही सताया गया है।।