Wednesday, February 23, 2011

विकलांगों का अजायबघर

धर्म की नगरी में विकलांगता का राज

  • एम अफसर खान सागर
कमला पटेल- ज़िन्दगी बे मकसद कट गई

सोनी शर्मा- माँ-बाप देख कर होजाते हैं निराश

वाराणसी को धर्म नगरी या भारत की सांस्कृतिक राजधानी के नाम से पूरा विश्व जानता है मगर लोग ये नहीं जानते कि यहां विकलांगों का अजायबघर भी है। हर तरह के विकलांग किसी का हाथ टेढा तो किसी का पैर तो कोई कमर के नीचे विकलांग तो कोई कैंचाकार। विश्व में शायद ही कोई गांव ऐसा होगा जहां बच्चों की पैदाइश पर खुशियाँ न मनाकर मातमपुर्सि किया जाता है। वजह साफ है कि लोगों को इन्तजार रहता है उनके बच्चों के विकलांग होने का। ग्रामवासियों को आजतक यह पता नहीं चल सका कि विकलांगता गांव के लिए बीमारी है या किसी सन्त फकीर का अभिशाप। तकरीबन पच्चास सालों से विकलांगता की दंश झेल रहे वाराणसी के दो गांव पूरे और हरसोस के लोगों की बीमारी का इलाज वाराणसी के महकमा-ए-सेहत के पास मौजूद नहीं हैं। जांचों से पता चले बीमारी के आगे उत्तर प्रदेश की महकमा-ए-सेहत लाचार और मजबूर नजर बाती है। तकरीबन दस हजार की आबादी वाले इन गावों में हर तीसरे घर का कोई न कोई सदस्य विकलांगता का शिकार है तथा दिन-ब-दिन विकलांगता अपना दायरा बढा रही है। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक अपाहिज की जिन्दगी जी रहे हैं वो भी अन्य सदस्यों के रहमो करम पर।

रामधनी पटेल- कौन सुने मेरा दर्द

अनिल पटेल- कौन करेगा बेडा पार

जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर सेवापूरी ब्लाक में वाराणसी-इलाहाबाद मार्ग पर एक गांव है पूरे तथा दूसरा गांव है हरसोस जो वाराणसी के अराजीलाइन ब्लाक का हिस्सा है। ये गांव पिछले पच्चास सालों से विकलांगता की मार झेलते-झेलते विकलांग गांव के नाम से मशहूर हो गये हैं। गांव में बच्चों की पैदाईश तो सामान्य होती है मगर 06 से 07 वर्श की उम्र तक जाते-जाते उनके पैर सूखने लगते हैं तथा वे विकलांग हो जाते हैं। गांव के बुजूर्गों को भी नहीं पता है कि यह बीमारी यहां कैसे पहुंची। राम सजीवन पटेल 36 बताते हैं कि ‘करीब पच्चास साल पहले रज्जू राम 67 और उनकी पत्नी जगपत्ती 61 के दोनों पैर खराब हुए थे। तब ग्रामवासीयों को इस बात का अन्दाज नहीं था कि गांववालों के माथे पर विकलांगता का तिलक लगने जा रहा है। गांव में अपाहिजों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कुछ घर ऐसे हैं जहां पति-पत्नी अपाहिज हैं तो बच्चे स्वस्थ तो कुछ घरों में बच्चे अपाहिज तथा कई एक घर ऐसे हैं जहां पूरा परिवार ही विकलांगता का दंश झेल रहा है। अगर वाराणसी के महकमा-ए-सेहत के आंकडों पर गौर फरमायें तो पता चलता है कि पूरे गांव में 66 लोग विकलांगता के पात्र हैं तथा हरसोस गांव में 58 लोग विकलांग हैं जिनमें केवल 18-20 लोगों को सरकारी सुविधा के नाम पर विकलांग पेंशन मिलता है। जबकि असली चेहरा कहीं ज्यादा भयावहः है।

विकास और माया - भाई-बहन दोनों को विकलांगता ने मारा

अनीता - शादी को दूल्हा नहीं मिल रहा है


पूजा- मौत बेहतर है इस ज़िन्दगी से

विकलांगता के क्या वजह है अगर इसपर निगाह डालें तो तकरीबन दो साल पहले महकमा-ए-सेहत वाराणसी ने कैल्सियम की कमी व पानी का दूशित होना बताया था और कई बार कैम्प लगाकर कैल्सियम व आयरन की गोलियां भी बांटी गई मगर नतीजा सिफर रहा। फिर बी एच यू के विषेशज्ञयों की एक टीम बनी जिसमें न्यूारे सर्जन व आर्थोपेडिक सर्जन समेत अन्य डाक्टर थें जिन्होने पानी के पांच नमूनों की क्रास जांच कराया एक खुद बी एच यू से तथा दूसरी जल निगम लखनउ से ऐसा मुख्य चिकित्साधीकारी वाराणसी डॉ. आर.एस. वर्मा बताते हैं। मगर दोनों ही जांच रिर्पोट सामान्य आया। मुख्य चिकित्याधिकारी, वाराणसी डॉ.आर.एस. वर्मा बताते हैं कि ‘‘पानी के नमूने जो जांच हेतु गयें थे उसकी रिर्पोट सामान्य आयी है। फिर पोलियो फलोरेसिस और लैथरिज्म की जांच करायी गयी जिसकी रिर्पोट भी सामानय आयीं हैं। इसके बाद हमने बी एच यू की टीम से गहन अध्ययन कर इन विकलांगों की मसल्स बायोप्सी के लिए नमूना नेशनल इंस्टीट्यूट मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरो साइंस बैंगलोर भेजा गया जहां से इनको एडवांस मसकूलर डिस्ट्राफी नामक रोग होना बताया गया।’’ यह पूछे जाने पर की एडवांस मसकूलर डिस्ट्राफी क्या रोग है तथा इसका इलाज क्या है? तो मुख्य चिकित्याधिकारी, वाराणसी डॉ. आर.एस. वर्मा ने बताया कि इस रोग में मांसपेशियाँ कमजोर हो कर सिकुडने लगती हैं तथा धीरे-धीरे मरीज विकलांग होने लगता है। जहां तक इलाज का सवाल है तो अभी तक इस रोग का इलाज संभव नहीं हो पाया है। डा वर्मा ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि मैंने अपने जीवन में इस तरह गांव का गांव रोगी नहीं देखा।’’

मुख्य चिकित्साधीकारी वाराणसी डॉ. आर.एस. वर्मा।

अगर हम सी.एम.ओ.साहब की माने तो एडवांस मसकूलर डिस्ट्राफी एक लाइलाज और भसंकर बीमारी है जिसका इलाज कम से कम बकौल मुख्य चिकित्याधिकारी, वाराणसी अभी तक संभव नहीं है। ऐसे में इन विकलांगों का जीवन यूं ही रेंगते-रेंगते कट जायेगा तथा ये समाज से कटे-कटे ही शमशान की राह कूच कर जायेंगे। हो सकता है कि आनेवाली इनकी नस्लें भी इस रोग से ग्रसित होकर खत्म हा जायें? आाखिर कैसे बचे इनका कुल? उस मरीज की मनोदशा के बारे में जरा सोचें जिसे ये बताया जाए कि मौत ही तुम्हारा इलाज है? कौन करेगा ऐसे लोगों से शादी जिसका पैर कब्र में लटका हो? तमाम अनुत्तरित सवाल लिये ये लोग यक्ष की तरह खडे हैं सरकार समाज व जनसेवको के इन्तजार में।


किशन और सूरज- भगवन मेरा क्या कसूर है

महिमा- ज़िन्दगी से पहले मौत का मंज़र

हरसोस के भग्गू राजभर, कल्लू मौर्या, लालदेही, कुमारी पूजा, अंकित, लालजी पटेल, दषमी, प्रियंका हों या पूरे के रामधनी, अरविन्द, अनन्त, वीरेन्द्र, शब्बो या मु0 सलीम इन सब की दर्द सिर्फ एक है विकलांगता। इस भयंकर बीमारी के बाबत पूछने पर लोग खामोशी अख्तियार कर लेते हैं। लोगों को डर इस बात का है कि खबर छपने पर गांव की जगहंसायी होगी। काफी कुरेदने के बाद पूरे गांव निवासी रामसजीवन पटेल बताते हैं कि ‘‘श्याम प्यारी पटेल ;72 को अज्ञात बीमारी ने अपने चपेट में ले लिया जिनका इलाज वाराणसी स्थित एक निजी चिकित्सालय में हो रहा था डाक्टर ने कहा कि अब ये ठीक नहीं होंगी। वहीं दूसरी तरफ अमीन की 20 वर्षीय बेटी शब्बो दोनों पैर से विकलांग है, जिसका इलाज अच्छे डॉक्टरों से कराया गया तथा बीस हजार से ज्यादा खर्च हुआ मगर वह ठीक नहीं हो पायी। धन के आभाव में अब इन्होने खुदा पर बेटी को छोड़ दिया है। अनिल पटेल 23 के दोनों पैर विकलांगता ने लील लिया। ट्राईसाइकिल व परिवार के लोगों के सहारे जिन्दगी किसी तरह बसर हो रही है। हरसोस और पूरे गांव में विकलांगता के साम्राज्य का पता इसी से लगाया जा सकता है कि रामबली पटेल तो ठीक है मगर उनके सात में पांच बच्चे विकलांग हैं। जिसमें अरविन्द 19 की चार वर्ष पूर्व व अनंत 16 की गत मई में मौत हो गयी। इसके अलावा सरिता 18 किशन 09 व सूरज 11 अभी भी इस अज्ञात बीमारी से जूझ रहे हैं। महिमा 07 को देख कर कोई यह बता ही नहीं पायेगा कि इसकी उम्र सात वर्ष है। इनके पिता जोखू बताते हैं कि ‘‘पैदाईश के दो वर्ष बाद ही इसे किसी अज्ञात बीमार ने जकड़ लिया। डाक्टरों को दिखाने पर पता चला कि इसकी मानसिक स्थित खराब है जो कभी ठीक नहीं हो सकती है।’’ ऐसे ही कैलाश पटेल की पत्नी बसन्ती 32, लड़की माया 16 व बेटा विकास 13 की के साथ ही अजय गुप्ता 14, वीरेन्द्र 15, अनिता 20, नीतू 16 इस भयंकर त्रासदी से लड़ रहे हैं। गांव की दर्द भरी दास्तां बताते हुए रामसजीवन पटेल रूआसें गले से कहते हैं कि ‘‘लड़को की तो छोड़िए बहन-बेटियों की शादी होने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। गांव में लोग शादी करने से कतरा रहे हैं। अगर कहीं शादी की बात भी चल रही है तो विकलांगता की वजह से लोग मुकर जा रहे हैं।’’
विकलांगता से लोगों की जिन्दगी पहाड़ बन गयी है। दर्जनों लोग अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते, परिजनों के प्यार और दुलार के भरोसे जिन्दगी की तवील सफर रेंग कर तय कर रहे हैं। मु0 सलीम (दुक्खू) 32 कमर से नीचे पूरी तरह विकलांग हैं और उसकी पत्नी सोना 29 भी विकलांग है इनको आसरा रहता है परिवार वालों का। सलीम बताते हैं कि ‘‘साहब फोटो खिंचवावे के खातिर गांव क लोग मना करे लन की ऐसे दूर-दूर तक खबर पहुंची आउर गांव क जग हंसायी होई। शादी-विवाह में अडचन पड़ी।’’ आगे सलीम कहते हैं कि ‘‘प्रधान जी कहते हैं की जेके विकलांग पेन्शन ह वोके लाल कार्ड ना मिली, साहब अब त हमहन क उपरे वाला मालिक बाडन।’’ इस बाबत ग्राम प्रधान ने बताया कि हमने शासन को काफी लिखा मगर शासन से कुछ सुविधायें ही नहीं मिल रही हैं। गांव के रामधनी पटेल 50 के दोनों पैर इस बीमारी से पूरी तरह सूख चुके हैं। इनको चलने-फिरने में ही नहीं वरन् नित कर्म में भी परिवार वालों के सहारे की जरूरत है। रामधनी बताते हैं कि ‘‘जब होश ना रहल तबै से विकलांग बाडी, कट रहल बा बाबू जी केहु तरह। आखीरी पड़ाव बा जीवन क, कबौ बुलावा आ सके ला।’’ सरकारी सुविधा के नाम पर चिढ़ कर कहते हैं कि ‘‘ जेकर भोले नाथ ही सब हर लेलन वोके कोई का देही। न डॉक्टर आवे लन ना ही मिनिस्टर, सब मउज मारत बा।’’ दूसरी तरफ कमला पटेल 49 सिर्फ इस आस पर जिये जा रहे हैं कि कभी तो शासन उन पर ध्यान देगी।

वीरेंद्र, अजय और शब्बो- विकलांगता ने बनाया तमाश


सलीम- खुद चलूँ या परिवार को खींचू

विकलांगों का अजायबघर पूरे गांव अपने विकलांगता के लेबल की वजह से समाज से कटा महसूस करता है। गांव में लोग रिश्ते के लिए नहीं तैयार हैं। जिसकी वजह से स्वस्थ और ठीक लोगों की भी शादी हो पानी मुश्किल है। गरीबी से जूझते लोगों के पास दो वक्त की रोटी जुटाना पहाड साबित हो रहा है, ये लोग इस भयंकर बीमारी का सामना कहो से कर सकते हैं। विकलांगता की वजह से नवजवानों में अवसाद को बढ़ावा मिल रहा है। जिससे कि पहले कुछ युवाओं ने आत्महत्या का प्रयास किया था मगर लोगों के समझाने पर वे किसी तरह माने। अनकरीब बह समय आ सकता है जब ग्रामीण कुण्ठा की भावनासे ग्रसित हो कर कोई गलत कदम उठा सकते हैं। इस भयंकर व लाइलाज बीमारी से वाराणसी का स्वास्थ महकमा हाथ तो खडा ही कर दिया है मगर अब जरूरत शासन और राजनेताओं की है कि पहल करके इन गावों के लोगों की बेहतरी की खातिर एक विशेष जांच दल बनाया जाए जिसमें देश - विदेश के डाक्टर व वैज्ञानिक शामिल हो जो इनके इलाज का कोई तरकीब निकाल सकें। वरना भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी का अभिन्न अंग पूरे व हरसोस गांव भारत के माथे पर विकलांगता का कलंक बनकर उभरेगा तथा जिसकी जिम्मेदारी स्वास्थ विभाग के साथ हम सभी की होगी।

कैसे पीला होगा सब्बो, सोनी, माया, पूजा का हाथ

शब्बो, सोनी और माय- आखिर कौन थामेंगा इनका हाथ.

विकलांगता के स्याह अन्धेरे में फंसे पूरे व हरसोस गांव में उन युवका-युवतियों की शादियाँ होना दूभर हो गयी जिनके पैर इस बीमारी से सूख चुके हैं। जिन घरों में लड़कियां जवान हो चुकी हैं उनके माता-पिता को यह दर्द हमेशा सता रहा है कि वे अपनी लाड़ली के हाथ कैसे पीला करेंगे ? रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट जा रहा है। बार-बार रिश्ता टूटने से आजिज आकर कुछ परिवारों ने तो इन्हे जीवन भर पालने का इरादा पुख्ता कर लिया है। पूरे गांव में षादी का न होना आज ए गम्भीर समस्या बन चुकी है।
वाराणसी के पूरे व हरसोस गांव में अब तक सौ से ज्यादा लोग विकलांगता की बीमारी की चपेट में आ चुके हैं तथा दिन-ब-दिन इनके तायदाद में बढ़ोत्तरी होती जा रही है। खास बात यह है कि पूरे गांव से सटे डंगरीया, लच्छापुर, ठठारां, चित्रसेनपुर गांव के लोग पूरी तरह से स्वस्थ हैं। अमीन अंसारी ने बेटी सब्बो 20 वर्ष की शादी के लिए दिन-रात एक कर दिये मगर बात नहीं बनी। अब वो थक कर बैठ चुके हैं। किसी तरह परिवार को जिन्दा रखे हुए हैं। उन्होने यह आस भी छोड़ दिया है कि कोई उनकी बिटिया का हाथ भी थामेगा। सोनी शर्मा 19 दोनों पैर से विकलांग है तथा नवीं कक्षा की छात्रा है। पिता लोलारक शर्मा मुम्बई में सैलून चला कर किसी तरह परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं। मां मुनरावती देवी बताती हैं कि पैरसे कमर तक सोनी का शरीर बेजान है। इस हालत में कौन उससे शादी करने को तैयार होगा। बस आखिरी इच्छा यही है कि पढा-लिख कर वह कुछ काबिल हो जाये ताकि उसें जीवन का अन्धकार मिट सके।
लउधर अपनी बेटी कान्ति की शादी न कर परने के दुःख से फफक पडता है। कान्ति दोनों पैर से लंगड़ी है। भाई ज्वाला कहता है कि पांच साल पहले एक विकलांग लड़के से शादी तय हुई थी, लड़के वालों ने भारी-भरकम दहेज की मांग की जिसकी वजह से रिष्ता नहीं तय हो पाया। जिसे दो वक्त की रोटी के लिए हाड़-तोड़ मेहनत करना पड़े वह इतना दहेज कहां से लायेगा।
अनिल पटेल 22 शादी न होने की वजह से एक बार जान देने की कोशिश कर चुका है। खरपत्तू बेटे की शादी के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं मगर लंगड़े को कौन लड़की देगा। दोनो पैरों से विकलांग शाहिद 23 वर्ष के पिता निजाउद्दीन तो विकलांग लड़की ढूंढ़ कर थक चुके। जावेद अंसारी 21 वर्ष स्नातक का छात्र है। बड़े भाई आफताब अंसारी ने बताया कि हमारी मंशा है कि हम जावेद को पढ़ा कर इस काबिल बना दें कि लोग खुद उसके भाई के लिउ रिश्ता लेकर आयें।
पूरे गांव में विकलांगता ने लोगों के चेहरों से हंसी छीन ली है। शादी तो दूर की बात है इनसे लोग मिलना भी नहीं पसन्द करते हैं। ऐसे हालात में इनके लड़के व लड़कीयों के हाथ कैसे पीले होंगे ? यह प्रश्न इनको हमेशा सालता रहता है।

7 comments:

  1. achchi story hai or likha bhi achcha hai.

    ReplyDelete
  2. कमाल की रिपोर्टिंग... आंखे नम हो गई पढते-पढते।

    डा.अजीत

    ReplyDelete
  3. bossss tusi great hoooo ......... aapki es rachna ko tahe dil se naman karten hayn.... bahut khub...

    ReplyDelete
  4. DIL KO NICHOD DETEY HO AFSAR BHAI BAHUT KHUB AGEY BADO YAHI DUA HAI MERI

    ReplyDelete
  5. patta na kaha sey likh likh kar mery dil me dard detey ho yar bas bhi karo mat rulaya kar duniya badi bedard hai kisi key dil ki bat nahi samajhhty mai kya bolu tusi great yar afsar

    ReplyDelete
  6. viklang hone ka drd nhi par viklang ko kisi rojgar se na jod pana yhi hmari sbse bdi bhul hai aagar aap ke pas aesi koi dharmik sansta hai to aese viklango ke liy aarthik uparjan ke sadhn nisulk uplbdh krvaiye

    ReplyDelete
  7. कमाल की रिपोर्टिंग...

    ReplyDelete